Homeझारखंडसिर्फ आरोप, दोष नहीं: Hemant Soren की कानूनी लड़ाई

सिर्फ आरोप, दोष नहीं: Hemant Soren की कानूनी लड़ाई

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Article by: कृतज्ञ सिन्हा एवं आर्यन रंजन (NUSRL)

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30 सितंबर 2026 की शाम रांची की विशेष पीएमएलए अदालत में हुई कार्यवाही केवल एक न्यायिकऔपचारिकता नहीं थी। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren के विरुद्धधन–शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 3 के साथ धारा 4 के अंतर्गत आरोप निर्धारित किएगए।अदालत द्वारा आरोपों को हिंदी भाषा में पढ़कर समझाया गया। आरोपों को सुनने के बाद हेमंत सोरेन ने स्वयंको निर्दोष बताया और न्यायिक विचारण का सामना करने की इच्छा व्यक्त की।

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यह मामला बड़गाईं अंचल की लगभग 8.86 एकड़ भूमि से संबंधित है। आरोप निर्धारित होने के साथ ही यहमामला जांच और अभियोजन के चरण से आगे बढ़कर साक्ष्य के चरण में प्रवेश कर गया है। अब अभियोजनपक्ष को न्यायालय के समक्ष अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे और आरोपी को उन साक्ष्योंका प्रतिवाद करने का अवसर मिलेगा।इस प्रकार, 30 सितंबर 2026 की यह कार्यवाही मामले की न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण काप्रतिनिधित्व करती है, जिसका प्रभाव कानूनी प्रक्रिया के साथ–साथ झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य पर भी पड़सकता है।

अदालत के आदेश में क्या दर्ज है?

अदालत के आदेश के अनुसार, 30 सितंबर 2026 को सुनवाई की शुरुआत में हेमंत सोरेन की ओर से उनकेअधिवक्ता ने कार्यवाही स्थगित करने का अनुरोध किया। बचाव पक्ष ने बताया कि झारखंड उच्च न्यायालय मेंदायर आपराधिक रिट याचिका संख्या 589/2026 में पीएमएलए की धारा 44(1)(d) की संवैधानिक वैधता कोचुनौती दी गई है। इसी मामले में अंतरिम आवेदन संख्या 14109/2026 के माध्यम से विशेष न्यायालय की आगेकी कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग भी की गई थी। चूँकि यह मामला उसी दिन दोपहर 2:15 बजे उच्चन्यायालय की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध था, इसलिए बचाव पक्ष ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया।

विशेष अदालत ने सीमित समय के लिए यह अनुरोध स्वीकार करते हुए आरोप तय करने पर विचार कीकार्यवाही शाम 4:15 बजे तक स्थगित कर दी।

शाम को मामले की दोबारा सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने अभियोजन की ओर से विशेष लोकअभियोजक तथा अभियुक्त की ओर से उपस्थित अधिवक्ता को सुना। न्यायालय ने अभियोजन शिकायत, पूरक अभियोजन शिकायत, अभियोजन द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों तथा मामले के अभिलेख पर उपलब्ध अन्यसामग्री का परीक्षण किया।

इन सामग्रियों के आधार पर न्यायालय ने यह माना कि अभियुक्त द्वारा आरोपित अपराध किए जानेकी प्रथमदृष्टया उपधारणा के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। इसके परिणामस्वरूप हेमंत सोरेन के विरुद्धआरोप निर्धारित किए गए।

मामले में अन्य 16 अभियुक्तों के विरुद्ध पहले ही आरोप तय किए जा चुके थे। इसलिए अब न्यायालय नेअभियोजन को कानून के अनुसार अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने अभियुक्त द्वारा 24 सितंबर 2026 को अनाश्रित दस्तावेजों की सूची के संबंध में दाखिल आपत्ति तथाप्रवर्तन निदेशालय द्वारा दिए गए लिखित उत्तर पर सुनवाई के लिए भी अगली तारीख निर्धारित की। अभियोजनसाक्ष्य के लिए अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले की शुरुआत भूमि से संबंधित कथित अनियमितताओं की जांच से हुई। प्रवर्तन निदेशालय ने 31 जनवरी 2024 को हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी से पहले उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद सेइस्तीफा दे दिया था।

मार्च 2024 में प्रवर्तन निदेशालय ने लगभग 5,500 पृष्ठों की अभियोजन शिकायत दाखिल की। विशेषन्यायालय ने 4 अप्रैल 2024 को इस मामले का संज्ञान लिया। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय ने लगभग 8.86 एकड़ भूमि को कुर्क किया।

28 जून 2024 को झारखंड उच्च न्यायालय ने हेमंत सोरेन को जमानत प्रदान की। उस समय उच्च न्यायालय नेप्रथमदृष्टया यह टिप्पणी की थी कि उस चरण पर उन्हें संबंधित अपराध का दोषी मानने के लिए पर्याप्त आधारदिखाई नहीं देते।

बाद में, 8 जून 2026 को विशेष न्यायालय ने उनकी उन्मोचन याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद 18 सितंबर 2026 को उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायालय की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करदिया। अंततः 30 सितंबर 2026 को विशेष न्यायालय ने उनके विरुद्ध आरोप निर्धारित कर दिए।

हालाँकि, उच्च न्यायालय के समक्ष इस मामले से संबंधित उनकी मुख्य याचिकाएँ अभी लंबित हैं।

पीएमएलए की धारा 3: धन–शोधन अपराध की संरचना

धन–शोधन निवारण अधिनियम, 2002 की धारा 3 धन–शोधन (Money Laundering) के अपराध कोपरिभाषित करती है।

सरल शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति अपराध की आय (proceeds of crime) से संबंधित किसी प्रक्रिया यागतिविधि में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होता है जैसे उसे छिपाना, प्राप्त करना, अपने कब्जे में रखना, उसका उपयोग करना या उसे बेदाग/वैध संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करना तो ऐसी गतिविधि धन–शोधन के अपराधके अंतर्गत आ सकती है। इसमें ऐसी गतिविधि में जानबूझकर सहायता करना या उसका पक्षकार बनना भीशामिल है।

धारा 3 के संबंध में बाद के संशोधनों द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि धन–शोधन को एक सतत अपराध(continuing offence) माना जा सकता है। अर्थात् यदि कोई व्यक्ति अपराध की आय से संबंधित गतिविधिमें लगातार लाभ प्राप्त करता रहता है या उससे जुड़ा रहता है, तो अपराध का प्रभाव उस अवधि तक जारी रहसकता है।

इस प्रकरण को समझने के लिए दो अवधारणाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:

अनुसूचित अपराध (Scheduled Offence):

यह वह मूल अपराध है जो पीएमएलए की अनुसूची में शामिल है। उदाहरण के लिए, कुछ परिस्थितियों मेंआपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, कूटरचना और जालसाजी जैसे अपराध अनुसूचित अपराध हो सकते हैं।

इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय की जांच झारखंड पुलिस द्वारा दर्ज विभिन्न प्राथमिकी से संबंधित है, जिनमेंकथित भूमि–अभिलेखों में हेरफेर और जाली दस्तावेजों के उपयोग जैसे आरोप शामिल हैं।

अपराध की आय (Proceeds of Crime):

पीएमएलए की धारा 2(1)(u) के अनुसार, अपराध की आय से आशय ऐसी संपत्ति से है जो किसी अनुसूचितअपराध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त या अर्जित हुई हो। इसलिए अभियोजन के लिए यह स्थापितकरना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित 8.86 एकड़ भूमि वास्तव में अपराध की आय की कानूनी परिभाषा केअंतर्गत आती है और अभियुक्त का उस संपत्ति से ऐसा संबंध था जो पीएमएलए की धारा 3 में वर्णितगतिविधियों से जुड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India (2022) में स्पष्ट किया कि धन–शोधन पीएमएलए के तहत एक स्वतंत्र अपराध है, लेकिन इसके अस्तित्व केलिए अनुसूचित अपराध और उससे संबंधित अपराध की आय का होना आवश्यक है। इसका व्यावहारिक अर्थयह है कि यदि मूल अनुसूचित अपराध में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया जाता है, उसे उन्मोचित कर दियाजाता है या मूल प्राथमिकी ही रद्द हो जाती है, तो उस आधार पर धन–शोधन के मामले के जारी रहने परमहत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।

इसी कारण अनुसूचित अपराध और कथित अपराध की आय के बीच संबंध इस मामले में बचाव पक्ष के लिएमहत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा बना रह सकता है।

धारा 4: धन–शोधन के अपराध की सजा

पीएमएलए की धारा 4 के अनुसार धन–शोधन के अपराध के लिए कम से कम तीन वर्ष का कठोरकारावास दिया जा सकता है, जिसे सामान्यतः सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। इसके साथ जुर्माना भीलगाया जा सकता है। यदि धन–शोधन किसी ऐसे अनुसूचित अपराध से जुड़ा हो जो नारकोटिक ड्रग्स औरसाइकोट्रॉपिक सब्सटेंस से संबंधित है, तो अधिकतम सजा दस वर्ष तक हो सकती है। वर्तमान मामले में आरोपभूमि–अभिलेखों से संबंधित अनुसूचित अपराधों से जुड़े हैं। इसलिए धारा 4 के तहत सामान्य दंड व्यवस्था, अर्थात तीन से सात वर्ष तक का कारावास और जुर्माना, प्रासंगिक है। पीएमएलए में केवल आरोपी को दंडितकरना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अपराध की आय से संबंधित संपत्ति पर कार्रवाई भी महत्वपूर्ण है। धारा 5 केतहत ऐसी संपत्ति की अस्थायी कुर्की की जा सकती है और दोषसिद्धि के बाद धारा 8 के तहत विशेष न्यायालयसंपत्ति के अधिहरण का आदेश दे सकता है। इसलिए इस मामले के परिणाम का प्रभाव केवल अभियुक्त कीव्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ही नहीं, बल्कि विवादित संपत्ति के भविष्य पर भी पड़ सकता है।

धारा 24 और 45: अभियुक्त पर अतिरिक्त कानूनी भार

आपराधिक कानून का सामान्य सिद्धांत है कि अभियोजन को आरोपी का अपराध सिद्ध करना होता है औरआरोपी को निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए। पीएमएलए में इस सामान्य सिद्धांतसे कुछ अलग व्यवस्थाएँ हैं।

धारा 24 के तहत, अपराध की आय से संबंधित धन–शोधन के मामले में कुछ परिस्थितियों में यह उपधारणालागू होती है कि ऐसी आय धन–शोधन में शामिल है। ऐसी स्थिति में अभियुक्त पर इसके विपरीत तथ्य स्थापितकरने का भार आ सकता है।

इसी प्रकार धारा 45 के तहत जमानत के लिए विशेष शर्तें निर्धारित हैं। अभियोजन को जमानत का विरोध करनेका अवसर दिया जाता है और न्यायालय को यह संतुष्ट होना होता है कि अभियुक्त के अपराधी होने के पर्याप्तआधार नहीं हैं तथा जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।

धारा 44(1)(d): महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न

इस मामले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू पीएमएलए की धारा 44(1)(d) को लेकर उच्च न्यायालय में लंबितचुनौती है। 2019 में जोड़े गए प्रावधान के अनुसार, यदि पहले से दाखिल अभियोजन शिकायत के बाद की गईजांच में अतिरिक्त सामग्री प्राप्त होती है, तो उसके आधार पर दाखिल की गई बाद की शिकायत को उसी मूलशिकायत का हिस्सा माना जा सकता है। इसमें नए अभियुक्तों को शामिल किया जाना भी संभव है।

इसी प्रावधान के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय द्वारा अभियोजन शिकायत दाखिल होने और न्यायालय द्वारासंज्ञान लिए जाने के बाद भी आगे की जांच जारी रखने की व्यवस्था पर प्रश्न उठाया गया है।

बचाव पक्ष का मुख्य प्रश्न यह है कि यदि आरोप तय होने तक जांच पूरी तरह समाप्त नहीं होती और एजेंसी कोआगे भी जांच जारी रखने की अनुमति रहती है, तो अभियुक्त अपने बचाव की तैयारी किस उपलब्ध सामग्री केआधार पर करेगा। दूसरी ओर, अभियोजन का तर्क है कि जटिल आर्थिक अपराधों में पूरी सामग्री एक साथसामने आना आवश्यक नहीं है और वास्तविक तथ्यों तक पहुँचने के लिए आगे की जांच आवश्यक हो सकतीहै।

इस विवाद के केंद्र में निष्पक्ष विचारण का अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, और जांच एजेंसीकी वैधानिक जांच–शक्ति के बीच संतुलन का प्रश्न है। उच्च न्यायालय ने फिलहाल विशेष अदालत कीकार्यवाही पर अंतरिम रोक नहीं लगाई है।

इसे पिछले हिस्से की शैली में थोड़ा संक्षिप्त, सरल और अकादमिक कानूनी हिंदी में इस प्रकार लिखा जासकता है। मैंने साथ ही संबंधित कानूनी बिंदुओं को अद्यतन स्रोतों से मिलाकर रखा है। 

दोषसिद्धि हुई, तो पद का क्या होगा?

केवल आरोप तय होने से किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को अपना पद छोड़ने की कानूनी बाध्यता नहीं होती। लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 के तहत अयोग्यता मुख्यतः दोषसिद्धि और निर्धारितपीएमएलए की धारा 4 के तहत सामान्यतः न्यूनतम तीन वर्ष और अधिकतम सात वर्ष तक के कठोर कारावासका प्रावधान है। धारा 8(3) के अनुसार, किसी अपराध में कम से कम दो वर्ष की सजा होने पर व्यक्तिदोषसिद्धि की तारीख से अयोग्य हो जाता है और रिहाई के बाद भी छह वर्ष तक अयोग्यता जारी रहती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने Lily Thomas v. Union of India (2013) में लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा8(4) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसलिए केवल अपील दायर करने से दोषसिद्धि के परिणाम स्वतःस्थगित नहीं होते। हालाँकि, यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है, सजा का निलंबन और दोषसिद्धि पर रोकअलग–अलग बातें हैं। यदि केवल सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगती है, तो इससे हमेशा अयोग्यता समाप्तनहीं होती। इसके लिए दोषसिद्धि पर ही स्थगन आवश्यक हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत Lily Thomas से संबंधित बाद के मामलों में भी स्पष्ट किया है। इसका उदाहरण Rahul Gandhi v. PurneshIshwarbhai Modi में देखने को मिलता है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने 4 अगस्त 2023 को दोषसिद्धि पर रोकलगाई थी। इसके बाद उनकी संसदीय सदस्यता से जुड़ी अयोग्यता का प्रभाव समाप्त हुआ। इसलिए वर्तमानमामले में केवल आरोप तय होने से मुख्यमंत्री पद या विधानसभा सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती। वास्तविकसंवैधानिक और निर्वाचन संबंधी परिणाम तभी सामने आएंगे जब दोषसिद्धि हो और उस पर लागू कानूनीप्रावधानों के अनुसार अयोग्यता उत्पन्न हो।

आगे की डगर

अब मामले की आगे की प्रक्रिया अपेक्षाकृत स्पष्ट है। 30 नवंबर 2026 को अनाश्रित दस्तावेजों पर की गईआपत्ति पर सुनवाई होगी और इसके बाद अभियोजन साक्ष्य शुरू होगा। अभियोजन अपने गवाह पेश करेगा, जिनकी मुख्य परीक्षा और प्रतिपरीक्षा होगी। इसी चरण में यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रवर्तन निदेशालय कथितभू–अभिलेखों में हेरफेर और अभियुक्त के बीच संबंध को साक्ष्यों के माध्यम से कितना स्थापित कर पाता है।

अभियोजन साक्ष्य पूरा होने के बाद अभियुक्तों की धारा 313 के तहत परीक्षा होगी, जिसके बाद प्रतिरक्षासाक्ष्य, अंतिम बहस और निर्णय की प्रक्रिया आएगी।

इसी बीच, उच्च न्यायालय में धारा 44(1)(d) की संवैधानिक वैधता और उन्मोचन से संबंधित याचिकाओं परहोने वाली कार्यवाही भी महत्वपूर्ण रहेगी। इन याचिकाओं के परिणाम का मामले की आगे की दिशा पर प्रभावपड़ सकता है। इस प्रकार, अब मामला आरोप तय होने के चरण से आगे बढ़कर साक्ष्य और न्यायिक परीक्षणके निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है।

राजनीति और क़ानून के बीच की रेखा

इस मामले में राजनीति और कानून दोनों की अपनी–अपनी भूमिका है। राजनीतिक दल अपने–अपने दावे औरआपत्तियाँ रख सकते हैं, लेकिन कानूनी रूप से केवल आरोप तय होने से पद छोड़ने की बाध्यता नहीं होती; दोषसिद्धि के बाद ही अयोग्यता का प्रश्न उत्पन्न होता है। साथ ही, गंभीर आरोपों के बीच पारदर्शिता औरन्यायिक प्रक्रिया में सहयोग महत्वपूर्ण हैं। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई पर उठने वाले प्रश्नों का अंतिम उत्तरराजनीतिक बयानबाज़ी में नहीं, बल्कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षण में मिलेगा।

अंततः, आरोप तय होना दोषसिद्धि नहीं है। अंतिम निर्णय साक्ष्यों के आधार पर होगा और तब तक निर्दोषता कीउपधारणा कायम रहनी चाहिए। यही निष्पक्ष न्याय–व्यवस्था की मूल कसौटी है

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