
DIG Road Controversy: झारखंड की सियासत में एक वरिष्ठ पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) के आवास और दशकों पुराने सार्वजनिक रास्ते को लेकर उपजा विवाद अब सीधे मुख्यमंत्री की चौखट तक पहुंच गया है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बेहद कड़ा और तीखा हमला बोला है। मरांडी ने बिना लाग-लपेट के दो टूक सलाह दी है कि अगर DIG साहब को अपने इलाके में इतनी ही असुरक्षा महसूस हो रही है, तो वे अपना बंगला बेचें और किसी पूरी तरह सुरक्षित जगह पर जाकर नया आशियाना तलाश लें।

‘मुफ्त में भी मिले तो ऐसी जगह न रहें, अफसर ने की मूर्खता’
बाबूलाल मरांडी ने अपने बयान में लिखा कि बात भले ही कड़वी लगे, लेकिन यह हकीकत है कि यदि किसी धार्मिक या सामाजिक वजह से कोई इलाका असुरक्षित बताया जा रहा हो और कोई मुफ्त में भी वहां रहने की शर्त पर जमीन दे, तो कोई भी समझदार व्यक्ति साफ इनकार कर देगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर DIG साहब ने खाकी वर्दी की ताकत और अपने रसूख के दम पर यह सोचकर जमीन खरीदी थी कि बाद में लोगों को दबाकर आम रास्ता बंद करा देंगे और माहौल को अपने हिसाब से मोड़ लेंगे, तो ऐसी मानसिकता को समझदारी नहीं बल्कि सीधे-सीधे प्रशासनिक मूर्खता कहा जाएगा।
सचमुच, अगर DIG साहब को लगता है कि जिस जगह वे रह रहे हैं, वह उनके और उनके अंगरक्षकों के लिए सुरक्षित नहीं है, तो मेरी नेक सलाह है कि वे वह घर बेचकर किसी दूसरी, “पूरी तरह सुरक्षित” जगह पर नया घर बना लें।
थोड़ा कड़वा जरूर लगेगा, लेकिन मैं यह बात बेहिचक कह सकता हूँ कि किसी धार्मिक या सामाजिक कारण से कथित रूप से असुरक्षित बताई जा रही जगह अगर कोई हमें मुफ्त में भी इस शर्त पर दे कि हमें वहीं रहना होगा, तो हम साफ मना कर देंगे।
फिर DIG साहब ने अगर वर्दी की ताकत और पद के प्रभाव के भरोसे यह सोचकर वह जगह खरीदी होगी कि बाद में रास्ता बंद करा देंगे, लोगों को दबा देंगे और माहौल को अपने हिसाब से मोड़ देंगे, तो ऐसी सोच को समझदारी नहीं, सीधे-सीधे मूर्खता ही कहा जाएगा।
जहाँ तक मुझे स्मरण है, जिस रास्ते से उन्हें आज कथित असुरक्षा का भय महसूस हो रहा है, वह रास्ता 1964 से चला आ रहा है। DIG साहब ने वह जगह संभवतः पाँच-छह वर्ष पहले खरीदी होगी। यानी रास्ता तब से है, जब शायद DIG साहब का जन्म भी नहीं हुआ होगा।
अब सवाल यह है कि जो रास्ता दशकों से आम लोगों के इस्तेमाल में रहा, वह अचानक DIG साहब के आने के बाद “सुरक्षा खतरा” कैसे बन गया?
क्या सुरक्षा का मतलब अब यह हो गया है कि जनता का रास्ता बंद कर दिया जाए और वर्दीधारी अफसर की सुविधा को कानून से ऊपर मान लिया जाए?
साफ बात है, समस्या रास्ते में नहीं है, समस्या उस सोच में है जो पद और वर्दी के घमंड में सार्वजनिक अधिकारों को अपनी निजी जागीर समझने लगती है।
@HemantSorenJMM— Babulal Marandi (@yourBabulal) October 2, 2026

‘जब DIG का जन्म भी नहीं हुआ होगा, तब से चल रहा है यह रास्ता’
पूर्व मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए लिखा कि जिस रास्ते को बंद करने के लिए आज कथित असुरक्षा का बहाना बनाया जा रहा है, वह रास्ता 1964 से यानी दशकों से आम जनता के उपयोग में है। उन्होंने कहा कि DIG साहब ने तो वह जमीन शायद पांच या छह साल पहले खरीदी होगी, जबकि वह रास्ता तब से आबाद है जब शायद खुद अफसर का जन्म भी नहीं हुआ था। मरांडी ने सवाल उठाया कि जो राह पीढ़ियों से आम लोगों की आवाजाही का जरिया रही, वह एक वर्दीधारी अफसर के कदम रखते ही अचानक सुरक्षा के लिए खतरा कैसे बन गई?
क्या वर्दीधारी की सुविधा कानून और जनता के हक से ऊपर है?
पुलिस व्यवस्था में कांस्टेबल, दरोगा और इंस्पेक्टर जैसे पदों पर भर्ती के दौरान शारीरिक फिटनेस को विशेष महत्व दिया जाता है, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जिन्हें सीधे मैदान में उतरकर कानून-व्यवस्था संभालनी पड़ती है।
वहीं, आईपीएस अधिकारियों के चयन में फिटनेस के साथ-साथ बौद्धिक क्षमता, निर्णय लेने की योग्यता, मानसिक संतुलन और नेतृत्व क्षमता का आकलन किया जाता है, क्योंकि उनके एक आदेश पर हजारों पुलिसकर्मी काम करते हैं।
ऐसे में सवाल बेहद गंभीर है कि यदि इतने बड़े पद पर बैठा कोई अधिकारी असामान्य, आवेगपूर्ण, सनकी या असंतुलित व्यवहार करने लगे, तो उसके परिणाम कितने खतरनाक हो सकते हैं? तनाव, भीड़, दंगा या किसी संकट की स्थिति में ऐसे अधिकारी का एक गलत, गैर-जिम्मेदाराना और अहंकारी फैसला पूरे समाज की शांति और सुरक्षा को आग में झोंक सकता है।
एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के हाथ में ए.के.-47 कानून-व्यवस्था की रक्षा का साधन है, लेकिन यदि वही हथियार किसी असंतुलित मानसिकता, सत्ता के नशे और विवेकहीन हाथों में चला जाए, तो वह सुरक्षा का प्रतीक नहीं, समाज के लिए गंभीर खतरे की चेतावनी बन जाता है।
नसीहत साफ है कि वर्दी सिर्फ ताकत नहीं देती, संयम और जवाबदेही भी मांगती है। जिस अधिकारी में मानसिक संतुलन, धैर्य और विवेक नहीं, उसके हाथ में पद भी खतरनाक है और हथियार भी।
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@ians_india— Babulal Marandi (@yourBabulal) October 1, 2026
हेमंत सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए बाबूलाल मरांडी ने पूछा कि क्या सुरक्षा के नाम पर जनता का पारंपरिक रास्ता छीन लिया जाएगा और किसी बड़े अफसर की निजी सुविधा को कानून व संविधान से ऊपर मान लिया जाएगा? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि असली समस्या रास्ते में नहीं है, बल्कि उस सामंती सोच में है जो पद, ताकत और वर्दी के अहंकार में आकर जनता के मौलिक और सार्वजनिक अधिकारों को अपनी निजी जागीर समझने की भूल कर बैठती है। इस सियासी हमले के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।


