
Digital Desk Naxatra Samachar: अगर आप पत्रकार हैं और यह सोचकर पार्टी दफ्तर जाते हैं कि वहां बैठकर दो मिनट सुस्ता लेंगे, अपनी स्टोरी टाइप कर लेंगे या किसी नेता से मिलकर अंदर की खबर निकाल लेंगे, तो जरा रुक जाइए! रांची में हरमू रोड वाले BJP दफ्तर में अब आपका बैठना पार्टी के प्रवक्ताओं और मीडिया प्रभारियों के लिए ‘समय की बर्बादी’ बन चुका है। वही पत्रकार, जिन्हें सोशल मीडिया पर लोग बात-बात में ‘गोदी मीडिया’ का ताना दे देते हैं, आज उसी पार्टी के दफ्तर में ऐसे खड़े हैं मानो बिन बुलाए मेहमान हों। बाहर चमचमाती गाड़ियां हैं, करोड़ों की लागत से खड़ी तीन-तीन आलीशान इमारतें हैं, दर्जनों एसी कमरे हैं, लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए एक कुर्सी तक नसीब नहीं है। दरवाजे पर सेलो टेप से बाकायदा एक सफेद पर्चा चिपका दिया गया है, जो साफ कह रहा है, काम नहीं है तो यहां मत बैठो, हमारा वक्त खराब होता है।



दरवाजे पर चिपका पर्चा, ‘प्रिय बन्धु’ बोलकर बेइज्जती का नया तरीका
BJP मीडिया विभाग के दरवाजे पर जो फरमान चस्पां किया गया है, उसके शब्द किसी भी आत्मसम्मान वाले पत्रकार को चुभने के लिए काफी हैं। उसमें लिखा है…”प्रिय बन्धु, आप सभी से आग्रहपूर्वक निवेदन है कि बिना किसी आवश्यक कार्य के मीडिया विभाग में अनावश्यक रूप से बैठ कर अपना तथा मीडिया विभाग के सदस्यों का समय बर्बाद न करें। धन्यवाद। आदेश: प्रदेश कार्यालय”
शुरुआत बड़े प्यार से ‘प्रिय बन्धु’ लिखकर की गई है, लेकिन असल संदेश साफ है, दफ्तर में कदम मत रखिए। अब सवाल यह उठता है कि क्या चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड या मूसलाधार बारिश में नेताओं के बयानों का इंतजार करना पत्रकारों का शौक है? क्या प्रेस नोट मिलने तक या बाइट के इंतजार में मीडिया सेल में दो मिनट बैठना ‘वक्त की बर्बादी’ है? या फिर पार्टी यह समझ बैठी है कि मीडिया का काम सिर्फ उनके मनमुताबिक ताली बजाना और प्रेस रिलीज को जस का तस छाप देना भर है?

पहले एक मकान था तो दरवाजे खुले थे, अब तीन बिल्डिंगें बनीं तो ‘वाघा बॉर्डर’ जैसी सख्ती
दशकों से BJP की बीट कवर करने वाले पुराने पत्रकार आज का यह हाल देखकर दंग हैं। एक जमाना था जब पार्टी का एक छोटा सा दफ्तर हुआ करता था। न तो कोई लिफ्ट थी, न डिजिटल कार्ड और न ही बाउंसरों जैसी सुरक्षा। उस दौर में कैलाशपति मिश्र, बाबुलाल मरांडी, रघुवर दास और सरयू राय जैसे बड़े नेता बरामदे में या सीढ़ियों पर खड़े होकर पत्रकारों से हंसी-मजाक करते थे, चाय की चुस्कियों के साथ खुलकर राजनीतिक बहसें होती थीं। तब किसी को नहीं लगता था कि पत्रकार वक्त बर्बाद कर रहे हैं।
मगर आज जब दाएं-बाएं मिलाकर तीन-तीन बड़ी-बड़ी इमारतें तन गईं, आलीशान सोफे लग गए, तो पत्रकारों के लिए जगह सिमट गई। आज तीसरे तल्ले पर बैठे संगठन के बड़े नेताओं से मिलने जाना ऐसा लगता है मानो कोई ‘वाघा बॉर्डर’ पार कर रहा हो। नीचे से लेकर ऊपर तक सवाल-जवाब, चेकिंग और ऐसी निगाहें जैसे कोई जासूस घुस आया हो।

सीधा फंडा… ‘बाइट लीजिए, पॉजिटिव खबर बनाइए और चलते बनिए’
पार्टी दफ्तर का मिजाज अब पूरी तरह कॉरपोरेट हो चुका है। मीडिया वालों के लिए अघोषित नियम बना दिया गया है, कैमरा लेकर आइए, नेताजी जो रटा-रटाया बयान दें उसे रिकॉर्ड कीजिए, कार्यक्रम को चमकाकर ‘पॉजिटिव’ खबर के रूप में दिखाइए और चुपचाप दफ्तर से बाहर का रास्ता नाप लीजिए। अगर आप वहां बैठकर कोई चुभता हुआ सवाल पूछने की कोशिश करेंगे, पार्टी की गुटबाजी को समझने के लिए किसी कार्यकर्ता से बात करेंगे, तो फौरन याद दिला दिया जाएगा कि ‘यहां बैठना मना है’।
अंदर मुस्कुराते बड़े नेता, बाहर तालेबंदी की तैयारी
कमरे के भीतर की दीवार पर नजर डालिए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जेपी नड्डा और प्रदेश अध्यक्ष की मुस्कुराती तस्वीरें बड़े-बड़े पोस्टरों पर दिखती हैं। वहां अंत्योदय और जनता से जुड़ने के बड़े-बड़े दावे लिखे हैं। लेकिन कमरे के ठीक मुहाने पर चिपका यह पर्चा संगठन के असली मिजाज को बयां कर देता है।
यह रवैया सिर्फ रांची तक सीमित नहीं है। अभी उत्तराखंड के देहरादून में भी यही तमाशा देखने को मिला, जब पार्टी की सह-प्रभारी बांसुरी स्वराज जगजीतपुर कार्यालय पहुंचीं तो मीडिया और कैमरा वालों के लिए सीधा ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा दिया गया। पत्रकार भरी दुपहरी में गेट के बाहर धूल फांकते रहे और अंदर बंद कमरों में नेताजी अपनी रणनीतियां बनाते रहे।
राजनीतिक दल जब जनता और पत्रकारों से दूरी बनाने लगें और अपने दफ्तरों को कॉरपोरेट कंपनियों की तरह चलाने लगें, तो समझ लीजिए कि जमीनी हकीकत से उनका नाता टूटने लगा है। रांची BJP दफ्तर का यह पर्चा आज राजधानी के हर मीडियाकर्मी की जुबान पर है और सब एक ही बात पूछ रहे हैं, अगर मीडिया विभाग में मीडिया ही नहीं बैठेगी, तो क्या यह कमरा सिर्फ नेताओं के आराम फरमाने के लिए बना है?


