
Ranchi: सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवाने वाले बिमल लकड़ा के पीड़ित परिवार को झारखंड हाई कोर्ट से एक लंबे इंतजार के बाद बड़ी राहत मिली है। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए परिजनों को मिलने वाली मुआवजे की राशि में तीन गुना से अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। ट्रिब्यूनल द्वारा पूर्व में तय की गई 10.60 लाख रुपये की राशि को बढ़ाकर अब 32.72 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने दावा दायर करने की तिथि से पूरे भुगतान पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी स्पष्ट निर्देश दिया है।

निचली अदालत का फैसला निरस्त और बीमा कंपनी को निर्देश
हाई कोर्ट ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को कड़ा आदेश देते हुए कहा है कि वह मुआवजे की बढ़ाई गई पूरी राशि आठ सप्ताह के भीतर अदालत में जमा कराए। अदालत ने यह भी साफ किया है कि पूर्व में परिजनों को दी जा चुकी रकम का समायोजन नई राशि में किया जाएगा। मुआवजे की यह राशि सभी वैध दावेदारों के बीच बराबर-बराबर बांटी जाएगी। इसके अलावा दुर्घटना का शिकार हुए बिमल लकड़ा के नाबालिग बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से अदालत ने उनके हिस्से की रकम को बालिग होने तक फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा रखने का निर्देश दिया है।

वर्ष 2000 में हुआ था भीषण सड़क हादसा
यह पूरा मामला वर्ष 2000 में हुई एक दुखद सड़क दुर्घटना से जुड़ा हुआ है। 19 जून 2000 की सुबह करीब 6:30 बजे बिमल लकड़ा अपनी मारुति कार से रांची से जमशेदपुर की ओर जा रहे थे। इसी दौरान रास्ते में सामने से आ रहे एक अनियंत्रित ट्रक ने उनकी कार में जोरदार टक्कर मार दी थी। इस भीषण हादसे में बिमल लकड़ा की मौके पर ही मौत हो गई थी। घटना के तुरंत बाद स्थानीय थाने में ट्रक चालक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी और पुलिस जांच के बाद अदालत में ट्रक चालक को ही आरोपी बनाते हुए आरोप पत्र दाखिल किया गया था।
केवल आमने-सामने की टक्कर लापरवाही का सबूत नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस पुराने फैसले को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें हादसे के लिए दोनों चालकों की संयुक्त लापरवाही मानी गई थी। उच्च न्यायालय ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल आमने-सामने की टक्कर हो जाने से दोनों चालकों की गलती नहीं मानी जा सकती। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि बिमल लकड़ा की ओर से कोई लापरवाही हुई थी। कार की बीमा कंपनी भी दुर्घटनास्थल का नक्शा या वाहन की तकनीकी जांच रिपोर्ट जैसी कोई ठोस सामग्री अदालत में पेश नहीं कर सकी, जिससे मृतक की गलती साबित हो सके।


