
Jharkhand High Court: जेल के अंदर एक कैदी के मर्डर केस में उम्रकैद काट रहे अनिल शर्मा की समय से पहले रिहाई (प्री-मैच्योर रिलीज) को लेकर झारखंड HC ने बड़ा फैसला दिया है। जस्टिस आर मुखोपाध्याय की बेंच ने स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया है, जिसके तहत अनिल शर्मा की रिहाई की अर्जी ठुकरा दी गई थी। अदालत ने बोर्ड को पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करने और हर पहलू का सही से असेसमेंट करते हुए एक डिटेल्ड और रीजन्ड आर्डर पास करने के निर्देश दिए हैं।

सिर्फ क्राइम की सीरियसनेस ही पैमाना नहीं
झारखंड HC ने साफ लफ्जों में कहा कि किसी भी कैदी की समय से पहले रिहाई पर विचार करते समय केवल अपराध की गंभीरता को ही इकलौता आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कैदी का जेल में ओवरऑल कंडक्ट (आचरण) कैसा रहा है, उसके सुधरने की कितनी गुंजाइश है, क्या उसके दोबारा क्राइम करने का रिस्क है और समाज में उसके पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) के क्या चांसेज हैं—इन सभी जरूरी पॉइंट्स पर भी बोर्ड को गंभीरता से गौर करना चाहिए।

25 मार्च के बोर्ड आर्डर को दी गई थी चुनौती
अनिल शर्मा ने HC में याचिका दायर कर स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड के 25 मार्च वाले उस फैसले को चैलेंज किया था, जिसमें उसे रिहा करने से मना कर दिया गया था। बोर्ड ने अपनी दलील में कहा था कि चूंकि अनिल शर्मा ने जेल परिसर के भीतर ही दूसरे कैदी की हत्या की थी, इसलिए यह काफी संगीन जुर्म है। इसके साथ ही बोर्ड ने यह आशंका भी जताई थी कि उसके बाहर आने से दोबारा गैंगवार छिड़ सकता है और लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ने का खतरा रहेगा।
हिरासत से भागने और पुराने रिकॉर्ड का हुआ था जिक्र
बोर्ड ने अपने रिजेक्शन नोट में इस बात का भी हवाला दिया था कि अनिल शर्मा पहले न्यायिक हिरासत से फरार हो चुका था, जिसके चलते उसे रिहा करना समाज के लिए सेफ नहीं माना गया। हालांकि, इन तर्कों पर HC ने दो टूक कहा कि रिहाई के तय मानकों में सुधार की संभावना और जेल आचरण को इग्नोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने बोर्ड को आदेश दिया है कि वह अपने पहले के रुख से आगे बढ़कर सभी कानूनी और मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नया आदेश जारी करे।


