
Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद और तलाक से जुड़े करीब 10 साल पुराने एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पति को निर्देश दिया है कि वह अपनी पहली पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता के तौर पर एकमुश्त 20 लाख रुपये का भुगतान करे। जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने जमशेदपुर फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि पति को यह पूरी रकम 12 महीने के अंदर चार समान किस्तों में चुकानी होगी।

2003 में हुई थी शादी, फैमिली कोर्ट के फैसले के बाद पति ने रचाया दूसरा ब्याह
यह पूरा मामला जमशेदपुर स्थित टाटा मोटर्स के कर्मचारी एन कुमार और उनकी पत्नी एस देवी (बदला हुआ नाम) से जुड़ा है। दोनों का विवाह साल 2003 में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। दांपत्य जीवन में खटास आने के बाद मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुंचा और जमशेदपुर फैमिली कोर्ट ने दोनों के तलाक की अर्जी को मंजूरी दे दी थी। फैमिली कोर्ट से तलाक का फैसला आने के बाद पति ने साल 2018 में दूसरी शादी रचा ली और अपना नया परिवार बसा लिया।

साथ रहने की गुंजाइश खत्म, पत्नी ने केवल गुजारा भत्ते की लगाई गुहार
फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ जब मामला झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ के सामने पहुंचा, तो परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आ चुका था। सुनवाई के दौरान पत्नी के वकील ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि चूंकि पति ने पहले ही दूसरी शादी कर ली है, इसलिए अब दोनों के बीच दोबारा साथ रहने या सुलह की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रह गई है। ऐसे में महिला ने अपने भविष्य, सामाजिक सुरक्षा और भरण-पोषण को ध्यान में रखते हुए केवल स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) दिलाने की मांग अदालत के सामने रखी।
47 हजार वेतन और 47 साल की उम्र, 4 किस्तों में देने होंगे 20 लाख रुपये
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पति के वित्तीय स्थिति और सैलरी स्लिप की गहन जांच की। दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने पाया कि पति टाटा मोटर्स में कार्यरत है और उसका मासिक वेतन करीब 47,000 रुपये है। दूसरी ओर खंडपीठ ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि पहली पत्नी की उम्र अब 47 वर्ष हो चुकी है और उसके पास जीवनयापन, रोटी-कपड़ा और मकान के लिए आय का कोई दूसरा स्वतंत्र जरिया मौजूद नहीं है। बढ़ती उम्र और आजीविका के अभाव को देखते हुए अदालत ने 20 लाख रुपये की एकमुश्त रकम को पूरी तरह न्यायसंगत और तर्कसंगत माना। अदालत ने सख्त निर्देश दिया कि पति को यह 20 लाख रुपये अगले 12 महीनों के भीतर चार बराबर किस्तों में पत्नी के खाते में जमा कराने होंगे।


