
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में साफ कर दिया है कि पत्नी का अलग रहना, अलग चूल्हा-चौका चलाना या पति-पत्नी के बीच बढ़ती दूरी को महज आधार बनाकर तलाक नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता का आरोप साबित करने के लिए गंभीर और ठोस सबूत होने जरूरी हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने एक डॉक्टर पति की तलाक की अपील खारिज करते हुए रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के फैसले को बरकरार रखा।

कहां से शुरू हुआ यह मामला?
यह मामला डॉ. मयंक और सहायक प्रोफेसर रीमा के विवाह से जुड़ा है। दोनों ने 28 जुलाई 2011 को पहले विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी की, और इसके बाद हिंदू रीति-रिवाज से भी विवाह संपन्न हुआ। शादी के समय पति किर्गिस्तान और रूस में एमडी फिजिशियन की पढ़ाई कर रहे थे, जबकि पत्नी लोहरदगा के बीएस कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत थीं।

पति का दावा, पत्नी पर लगाया क्रूरता का आरोप
पति ने विशेष विवाह अधिनियम की धारा 27(1)(d) के तहत क्रूरता को आधार बनाते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। उनका आरोप था कि पत्नी उनके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थीं, साथ ही गाली-गलौज और मानसिक प्रताड़ना भी देती थीं। पति के मुताबिक साल 2012 के बाद दोनों के बीच किसी भी तरह का वैवाहिक संबंध नहीं रहा। उनका यह भी कहना था कि एक ही घर में रहने के बावजूद पत्नी अलग चूल्हा-चौका चलाती थीं और उनसे बातचीत तक नहीं करती थीं, जिससे उन्हें गहरी मानसिक परेशानी हुई और उनकी पढ़ाई व करियर पर भी असर पड़ा।
पत्नी का पलटवार, बताई अपनी पीड़ा
वहीं पत्नी ने पति के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि शादी के समय उनके पिता ने 10 लाख रुपये नकद दिए थे, इसके बावजूद पति और ससुराल पक्ष की ओर से पढ़ाई के नाम पर लगातार पैसों की मांग की जाती रही और उन्हें प्रताड़ित किया गया। पत्नी के मुताबिक पति की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने खुद लोन लिया और ससुराल की सारी जिम्मेदारियां भी निभाईं। परेशान होकर उन्होंने बरियातू थाने में दहेज प्रताड़ना का मामला भी दर्ज कराया था। इतना सब होने के बावजूद उन्होंने कोर्ट में साफ कहा कि वे आज भी अपने पति के साथ रहना चाहती हैं और किसी भी सूरत में विवाह खत्म नहीं करना चाहतीं।
कोर्ट ने क्यों खारिज की तलाक की अपील?
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में पेश किए गए सभी सबूतों और गवाहों के बयानों की बारीकी से समीक्षा की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने पाया कि पति की ओर से लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट प्रकृति के थे, और ऐसी कोई ठोस घटना या पुख्ता सबूत सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी का व्यवहार इतना गंभीर था कि पति के लिए उनके साथ रहना नामुमकिन हो गया हो।
कोर्ट ने बताई मानसिक क्रूरता की सही कसौटी
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि तलाक मांगने वाले पक्ष पर ही यह साबित करने की जिम्मेदारी होती है कि दूसरे पक्ष का व्यवहार क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, छोटी-मोटी परेशानियां, स्वभाव में असहमति या पति-पत्नी के बीच सामान्य दूरी को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए ऐसा गंभीर आचरण साबित करना जरूरी है, जिसकी वजह से साथ रहना वाकई असंभव हो जाए। ठोस सबूतों के अभाव में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार करते हुए डॉक्टर पति की अपील को खारिज कर दिया।


