
Ranchi: दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में ‘विकसित भारत’ विषय पर आयोजित राज्यों के वित्त मंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक में झारखंड ने अपने आर्थिक हितों का पुरजोर तरीके से उठाया। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि विकसित भारत के लक्ष्य को केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित न रखकर इसे सामाजिक मजबूती और हर वर्ग के विकास से जोड़ा जाना बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि जब तक देश के सभी राज्यों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होगी, तब तक साल 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता।

विभिन्न नीतियों और बदलावों से झारखंड को भारी आर्थिक चपत
बैठक के दौरान वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार की विभिन्न नीतियों और हालिया संशोधनों का हवाला देते हुए राज्य को होने वाले बड़े वित्तीय नुकसान का कच्चा-चिट्ठा रखा। उन्होंने दावा किया कि केंद्र के फैसलों की वजह से झारखंड को लगभग 20 से 22 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने की आशंका है। इसमें मुख्य रूप से जीएसटी युक्तिकरण और मनरेगा के स्थान पर लाई जा रही नई योजना की वजह से करीब 6 से 8 हजार करोड़ रुपये की चपत शामिल है। इसके अलावा, खनिज संपदा से जुड़े कर और उपकर पर लगाई गई रोक के कारण राज्य को लगभग 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

MMDR कानून संशोधन से 1.36 लाख करोड़ की बकाया राशि पर संकट
खनिज और उद्योग से जुड़े मामलों पर बोलते हुए वित्त मंत्री ने MMDR (माइंस एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) कानून में किए गए बदलावों पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस कानून में धारा 9(d) जोड़े जाने के बाद अब झारखंड सरकार विभिन्न कोयला कंपनियों से करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि की मांग करने के अधिकार से वंचित हो जाएगी, जिससे राज्य के खजाने को बहुत बड़ा झटका लगेगा।
राज्यों के विकास के बिना समग्र विकास असंभव
अपने संबोधन के अंत में वित्त मंत्री ने संघवाद की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत राज्यों का एक संघ है और बिना राज्यों की आर्थिक मजबूती के देश का समग्र विकास कतई संभव नहीं है। उन्होंने चेताया कि केवल राष्ट्रीय औसत आय (नेशनल एवरेज इनकम) के बढ़ने भर से यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि विकास का लाभ समाज के आखिरी पायदान पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचा है या नहीं। इसके लिए आर्थिक तरक्की के साथ-साथ सामाजिक असमानता, आय के समान वितरण और सामाजिक सौहार्द जैसे पहलुओं पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।


