
Naxatra Digital Desk: कभी झारखंड के घने जंगलों में जिन नक्सली कमांडरों की तूती बोलती थी और जिनके नाम से ही इलाकों में खौफ पसर जाता था, आज वहां सन्नाटा है। पहाड़ों और बीहड़ों में समानांतर सरकार चलाने का दावा करने वाले माओवादी संगठन का किला अब ढहने की कगार पर पहुंच चुका है। एक वक्त था जब a इलाकों में कदम रखने से पहले सुरक्षा बलों को बेहद सतर्क रहना पड़ता था, लेकिन बीते एक साल में पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियानों ने बाजी पूरी तरह पलट दी है। जंगलों में खौफ का पर्याय बने बड़े चेहरे अब एक एक कर सलाखों के पीछे पहुंच रहे हैं।

एक करोड़ के मिसिर बेसरा से लेकर अजय महतो तक की गिरफ्तारी
इस पूरे अभियान में सुरक्षा बलों को सबसे बड़ी कामयाबी एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के रूप में मिली। इसके ठीक बाद जुलाई 2026 में पुलिस ने 25 लाख के इनामी और स्पेशल एरिया कमेटी के प्रमुख सदस्य अजय महतो उर्फ टाइगर को धर दबोचा। अजय महतो पर हत्या, IED धमाकों और सुरक्षा बलों पर कातिलाना हमलों से जुड़े 240 से ज्यादा गंभीर मामले दर्ज थे। झारखंड की DGP तदासा मिश्र के मुताबिक, इतने बड़े कमांडरों का पकड़ा जाना नक्सली नेटवर्क के लिए एक ऐसा करारा झटका है जिससे उनका संभलना अब नामुमकिन सा लग रहा है।

लातेहार से सरायकेला तक एक के बाद एक गिरे बड़े मोहरे
माओवादियों के खिलाफ यह घेराबंदी यहीं नहीं थमी। जुलाई के महीने में ही लातेहार के जंगलों से 15 लाख का इनामी रीजनल कमेटी मेंबर रवींद्र गंझू पुलिस के हत्थे चढ़ गया, जो 150 से अधिक वारदातों में वांटेड था। इसके बाद अगस्त में सरायकेला खरसावां जिले में पुलिस और सीआरपीएफ ने साझा ऑपरेशन चलाकर 15 लाख के इनामी मदन महतो, पांच लाख के इनामी रवि सरदार और 2 लाख की इनामी महिला नक्सली मीना को दबोच लिया। इनके पास से तीन एके 47 राइफलें भी बरामद की गईं। झारखंड पुलिस के आईजी ऑपरेशन्स नरेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि इन ताबड़तोड़ कार्रवाइयों से नक्सलियों का हथियारबंद दस्ता पूरी तरह बिखर चुका है।
अब बचे खुचे इनामी चेहरों पर कसा जा रहा शिकंजा
एक के बाद एक शीर्ष कमांडरों की गिरफ्तारी, बढ़ते आत्मसमर्पण और लगातार चलते सर्च ऑपरेशन ने राज्य में माओवादी गतिविधियों को बहुत छोटे से दायरे में समेट दिया है। जो इलाके कभी उनके सुरक्षित ठिकाने माने जाते थे, वहां अब पुलिस के पक्के कैंप स्थापित हो चुके हैं। अब सुरक्षा बलों की पैनी नजर उन चंद बड़े चेहरों पर टिकी है जो अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर भागते फिर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि जिस तेजी से यह अभियान आगे बढ़ रहा है, उससे वह दिन दूर नहीं जब झारखंड के जंगल पूरी तरह नक्सल मुक्त हो जाएंगे।


