
Ranchi: झारखंड समेत देश के कई हिस्सों में 22 सितंबर को करम पर्व पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आदिवासी समाज का यह प्रमुख त्योहार प्रकृति के प्रति आभार, भाई-बहन के अटूट रिश्ते और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। भादो महीने की एकादशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व में करम देवता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

सात दिन पहले ‘जावा जगाने’ से शुरू होती है परंपरा
करम पर्व की तैयारियां पूजा से करीब सात दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। गांव की युवतियां स्नान करके नदी या तालाब की बालू टोकरी में लाती हैं और उसमें गेहूं, मकई, जौ, चना तथा धान के बीज बोती हैं। इस पूरी प्रक्रिया को ‘जावा उठाना’ कहा जाता है। पूजा करने वाली युवतियां जिन्हें ‘करमयतीन’ कहा जाता है, सात दिनों तक जावा में पानी देकर उसकी देखरेख करती हैं। यह परंपरा खेती-किसानी और प्रकृति के प्रति गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।

भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का महत्व
करम पर्व में बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखकर करम देवता से प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि करम का पेड़ जीवन, हरियाली और खुशहाली का प्रतीक है। इस मौके पर गांवों और आखड़ा (सांस्कृतिक स्थल) में पारंपरिक करम गीतों और मांदर की थाप पर लोकनृत्य का आयोजन किया जाता है।
सांस्कृतिक पहचान और एकजुटता का संदेश
राजधानी रांची समेत पूरे झारखंड के गांव-गांव में करम पर्व को लेकर विशेष चहल-पहल है। लोग पारंपरिक वेशभूषा में सामूहिक रूप से पूजा में शामिल हो रहे हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि यह आने वाली नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोकगीतों और प्रकृति के संरक्षण से जोड़ने का बड़ा संदेश भी देता है।


