
कटिहार में बाढ़ ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। चारों तरफ पानी है। कई सड़कें और रास्ते डूब चुके हैं। घरों की चौखट तक बाढ़ का पानी पहुंच गया है। रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना भी लोगों के लिए चुनौती बन गया है। कोई भोजन को लेकर परेशान है तो कोई पशुओं के चारे की चिंता में है।

लेकिन इस मुश्किल वक्त में भी आस्था का रास्ता नहीं रुका। बाढ़ के पानी के बीच एक नाव चली और अपने साथ तीज की खुशियां लेकर पहुंची। नाव जब व्रती महिलाओं के दरवाजे तक पहुंची तो कुछ देर के लिए बाढ़ की परेशानी पीछे छूट गई।

नाव से पहुंची तीज की सामग्री
मामला कटिहार के बाढ़ प्रभावित अमदाबाद प्रखंड की दुर्गापुर पंचायत के सुदूर भवानीपुर खट्टी गांव का है। यहां तीज व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए सामाजिक कार्यकर्ता शेख मसौवर नाव लेकर पहुंचे। उन्होंने अपने निजी स्तर पर व्रती महिलाओं के लिए साड़ी, फल और तीज पूजा से जुड़ी जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई।
बाढ़ के कारण गांव तक पहुंचने वाले ज्यादातर रास्ते पानी में डूबे हुए हैं। ऐसे में बाजार तक जाना और पूजा का सामान खरीदना बेहद मुश्किल है। इसके बावजूद महिलाओं ने आस्था और विश्वास के साथ तीज का व्रत रखा। जब नाव गांव पहुंची और उसमें से साड़ी, फल और पूजा की सामग्री निकली तो महिलाओं के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दी।
बाढ़ के बीच अधूरा नहीं हुआ त्योहार
भागीरथी देवी और मानती देवी जैसी व्रती महिलाओं के लिए इस बार का तीज पर्व काफी अलग रहा। बाढ़ ने उनके सामने कई मुश्किलें खड़ी कर दीं। बाजार तक पहुंचना आसान नहीं था। जरूरी सामान जुटाना भी मुश्किल था। ऐसे में नाव के जरिए पहुंची मदद ने उनके त्योहार की खुशियों को अधूरा नहीं होने दिया। महिलाओं ने मदद पहुंचाने वाले शेख मसौवर को दुआएं और आशीर्वाद दिया।
शेख मसौवर का कहना है कि आपदा के समय जरूरतमंद लोगों के साथ खड़ा होना ही सच्ची इंसानियत है। उनका कहना है कि मुश्किल परिस्थितियों में छोटी सी मदद भी किसी के चेहरे पर बड़ी खुशी ला सकती है।
बाढ़ के बीच इंसानियत की तस्वीर
भवानीपुर खट्टी की यह तस्वीर सिर्फ राहत पहुंचाने की कहानी नहीं है। यह मुश्किल समय में भरोसे और अपनापन की मिसाल भी है। बाढ़ ने लोगों के रास्ते जरूर रोक दिए हैं। घरों तक पानी पहुंच गया है। जिंदगी की रफ्तार थम गई है। लेकिन इन महिलाओं की आस्था और उम्मीद को पानी नहीं डुबो सका। उस नाव में सिर्फ साड़ी, फल और पूजा सामग्री नहीं थी। उसमें उम्मीद थी। अपनापन था। और बाढ़ के बीच तीज की लौटती हुई मुस्कान थी।


