
Latehar: लातेहार जिला मुख्यालय से महज आठ किलोमीटर की दूरी पर बसा ठेकीटांड़ गांव आज के डिजिटल और आधुनिक दौर में भी विकास की बुनियादी रोशनी से कोसों दूर है। गांव की जमीनी हकीकत देखकर ऐसा लगता है मानो यह इलाका सदियों पुराने किसी दुर्गम और बीहड़ जंगल में फंसा हो। न पक्की सड़क, न सुरक्षित पुल और न ही सामान्य आवागमन की सुविधा। गांव के लगभग 500 आदिवासी आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर खुद की बनाई एक बांस की अस्थायी पुलिया के सहारे जिंदगी की राह तलाशने को विवश हैं।

नदी, डैम, पहाड़ और रेलवे ट्रैक के बीच कैद है भूगोल
ठेकीटांड़ गांव की भौगोलिक संरचना ही ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है। गांव के एक छोर पर रेलवे लाइन है, दूसरी ओर उफनती औरंगा नदी बहती है, पीछे गहरा डैम है और बाकी का पूरा हिस्सा ऊंचे पहाड़ और घने जंगलों से घिरा हुआ है। मानसून की शुरुआत होते ही पानी का स्तर बढ़ते ही यह पूरा क्षेत्र एक टापू में तब्दील हो जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, साल के करीब आठ महीने गांव से बाहर शहर या बाजार निकलना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता।

प्रशासनिक अनदेखी से तंग आकर खुद तैयार की ‘लाइफलाइन’
स्थानीय ग्रामीण मनोज उरांव, दशरथ उरांव सहित अन्य ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने गांव में सड़क और स्थायी पुल के निर्माण को लेकर वर्षों तक प्रखंड कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय तक चक्कर काटे। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अनगिनत आवेदन सौंपे, फरियाद लगाई और हर बार सिर्फ कोरे आश्वासन मिले। जब लंबा इंतजार निराशा में बदलने लगा, तो ग्रामीणों ने खुद चंदा इकट्ठा कर और श्रमदान करके डैम के पास बांस की एक अस्थायी पुलिया खड़ी कर दी। आज यही कच्ची पुलिया पूरे गांव की जीवनरेखा (लाइफलाइन) बनी हुई है। इसी डगमगाती पुलिया से होकर नन्हे बच्चे स्कूल जाते हैं और ग्रामीण राशन व बाजार के लिए निकलते हैं।
बरसात में तेज बहाव के बीच जानलेवा सफर, मरीज भी इसी के भरोसे
बरसात के दिनों में जब डैम और नदी का जलस्तर बढ़ जाता है, तो पानी बांस के ऊपर तक आ जाता है और तेज बहाव में संतुलन बनाना जानलेवा साबित होता है। इसके बावजूद ग्रामीणों के पास बाहर निकलने का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। किसी के अचानक बीमार पड़ने पर खटिया या कंधों के सहारे मरीजों को इसी संकरी बांस की पुलिया से पार कराकर अस्पताल पहुंचाया जाता है। 500 की आबादी वाले इस गांव के लोग आज भी सवाल पूछ रहे हैं कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होते हुए भी आखिर कब तक वे विकास की मुख्यधारा से कटे रहेंगे और ठेकीटांड़ को पक्की सड़क व पुल का हक कब मिलेगा।


