
Luguburu Ghantabari: झारखंड की इस माटी में दो संविधान रचे गए हैं। एक दिल्ली की संसद में कागज पर लिखा गया, तो दूसरा बोकारो के लुगुबुरु की पहाड़ियों पर पत्थरों पर उकेरा गया। अब इसी दूसरे संविधान की दिलचस्प और अनसुनी कहानी पहली बार एक किताब के पन्नों में दर्ज होकर पाठकों के सामने आने वाली है। वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सोमनाथ आर्य की 350 पन्नों की शानदार कॉफी टेबल बुक ‘लुगुबुरु घंटाबाड़ी : संताल आदिवासियों का संविधान’ बहुत जल्द लोगों के हाथों में होगी। इस खास किताब को रांची की संस्था ‘और एक प्रयास’ ने झारखंड सरकार के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय के साथ मिलकर तैयार किया है। इसके शोध और तकनीकी कामों में फिनलैंड की कंपनी ने भी मदद की है, जबकि जमीन पर रहकर पूरी जानकारी जुटाने में धोरोमगढ़ के अध्यक्ष बबुली सोरेन का अहम योगदान रहा है।

किताब के अंदर छिपे हैं इतिहास के अनसुलझे और हैरान करने वाले राज
यह महज कोई आम किताब नहीं, बल्कि इतिहास का एक जीता-जाता दस्तावेज है। इसमें उन जगहों की दुर्लभ तस्वीरें और नक्शे शामिल हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। दोरबार चट्टान पर आज भी उखल के 6 निशान मौजूद हैं, सीता नाला है जिसे संताल समाज गाय के दूध जितना पवित्र मानता है, और धोरोम दोलान गुफा है जहां बारह महीने लगातार पानी रिसता रहता है। लेखक का दावा है कि यहीं बैठकर संताल पुरखों ने पूरे बारह साल तक मंथन करके जल, जंगल, जमीन और समाज को चलाने के कड़े नियम बनाए थे।

देश के दिग्गजों ने की जमकर तारीफ, खुद राष्ट्रपति ने लिखी प्रस्तावना
इस किताब की सबसे बड़ी खासियत यह है कि देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने खुद इसकी प्रस्तावना लिखी है। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि हमारे पुरखों ने बहुत पहले ही यह बात समझ ली थी कि इस धरती की सुरक्षा सिर्फ जल, जंगल और जमीन को बचाने से ही मुमकिन है और आदिवासी इस दुनिया के असली पहले नागरिक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संदेश में इसे देश और दुनिया की अपनी तरह की पहली पुस्तक बताया है। वहीं, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लुगुबुरु को झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कहा है, जबकि विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो का मानना है कि यह किताब आज की युवा पीढ़ी को उनकी असली जड़ों से जोड़ने का काम करेगी।
विश्व मंच पर फैली है लुगुबुरु की ख्याति, इस बार और भी है खास तैयारी
संताल आदिवासियों के लिए लुगुबुरु किसी तीर्थ से कम नहीं है। इसे पहले से ही राजकीय महोत्सव का दर्जा मिला हुआ है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के बाद नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और यहां तक कि यूरोप जैसे 14 देशों से लाखों संताल यहां जुटते हैं और घंटाबाड़ी में माथा टेकते हैं। धोरोमगढ़ के अध्यक्ष बबुली सोरेन के मुताबिक इस बार के महोत्सव में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आने की पूरी तैयारी चल रही है, और इसी बड़े मंच से इस किताब का आधिकारिक लोकार्पण भी किया जाना तय माना जा रहा है। पत्रकारिता की दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाले डॉ. सोमनाथ आर्य की यह सातवीं किताब है, जो इससे पहले मलूटी के ऐतिहासिक मंदिरों पर भी अपनी शानदार रचना दे चुके हैं।


