
पटना: बिहार की राजनीति में दलित आरक्षण को लेकर सियासी बहस लगातार तेज होती जा रही है। ‘कोटे के अंदर कोटा’ और एससी आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच सामने आए मतभेद के बाद अब बिहार के लघु जल संसाधन मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने भी तीखा पलटवार किया है। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि जो लोग दशकों तक सत्ता में रहे हैं, उन्हें पहले अपना राजनीतिक हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए और उसके बाद दूसरों से सवाल पूछना चाहिए।

संतोष सुमन ने कहा, “हमारी किताब खुली है, अब अपनी किताब भी जनता के सामने खोलिए।” उन्होंने दावा किया कि महादलितों के विकास के लिए उनकी सरकार और उनके नेता जीतन राम मांझी को जब भी काम करने का मौका मिला, उन्होंने योजनाओं को जमीन पर उतारने की कोशिश की।

‘60 साल सत्ता में रहे, अब हमसे हिसाब मांग रहे’
संतोष सुमन ने कहा कि आजकल कुछ लोगों को दूसरों से हिसाब मांगने का शौक चढ़ गया है। उन्होंने सवाल किया कि जो लोग करीब छह दशक तक सत्ता के केंद्र में रहे और फैसलों में भागीदार रहे, वे अब उनसे हिसाब क्यों मांग रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पहले यह बताया जाना चाहिए कि इतने वर्षों में दलितों और महादलितों के लिए क्या किया गया। संतोष सुमन के मुताबिक, मुख्यधारा की सत्ता में उनके समाज को लंबे समय तक पर्याप्त अवसर नहीं मिला, लेकिन जितना अवसर मिला, उसमें महादलितों के लिए लक्षित योजनाएं लागू करने की कोशिश की गई।
मंत्री ने कहा कि सत्ता उनके लिए केवल पद हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाने का जरिया है।
जमीन, आवास और कौशल प्रशिक्षण का दिया हिसाब
संतोष सुमन ने महादलित विकास से जुड़ी कई योजनाओं और आंकड़ों का उल्लेख किया। उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि भूमिहीन महादलित परिवारों को आवासीय जमीन उपलब्ध कराने की योजना के तहत करीब 1.95 लाख परिवारों को आवासीय प्लॉट दिए गए और 5,717 एकड़ से अधिक भूमि का वितरण हुआ।
उन्होंने महादलित आवास योजना, शौचालय निर्माण, बच्चों को पोशाक, कौशल प्रशिक्षण और सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड जैसी योजनाओं का भी जिक्र किया।
संतोष सुमन के अनुसार, मुख्यमंत्री महादलित पोशाक योजना के तहत करीब 14.71 लाख बच्चों को लाभ मिला। वहीं दशरथ मांझी कौशल विकास योजना के तहत 2.19 लाख से अधिक महादलित परिवारों के लोगों को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिए जाने का दावा किया गया।
‘विकास मित्र’ और ‘विकास रजिस्टर’ का भी जिक्र
मंत्री ने कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने के लिए विकास मित्र की व्यवस्था की गई। उनके मुताबिक, 9,875 विकास मित्र पद निर्धारित किए गए थे। इनका उद्देश्य महादलित परिवारों और सरकार के बीच संपर्क स्थापित करना था।
उन्होंने ‘विकास रजिस्टर’ की व्यवस्था का भी उल्लेख किया। इसके जरिए बिजली, पानी, आवास, शौचालय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं की स्थिति की जानकारी जुटाने का प्रयास किया गया।
संतोष सुमन ने सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड, रेडियो वितरण, आंगनबाड़ी, क्रेच, मोबाइल चिकित्सा और महिलाओं के लिए नारी ज्योति कार्यक्रम जैसी योजनाओं को भी महादलित विकास से जुड़ी पहल बताया।
‘कोटे में कोटा किसी का हक छीनना नहीं’
संतोष सुमन ने स्पष्ट किया कि महादलित अवधारणा को उस समय सरकारी नौकरियों में एससी आरक्षण के भीतर अलग कोटे के तौर पर लागू नहीं किया गया था। उनके अनुसार, उस मॉडल का मुख्य आधार लक्षित कल्याणकारी विकास था।
हालांकि, एससी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ की मांग एक अलग संवैधानिक और नीतिगत मुद्दा है। संतोष सुमन का कहना है कि इसका उद्देश्य किसी वर्ग का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि उन समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना है जो लंबे समय से सबसे पीछे रह गए हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों तक पहुंचा और कौन से समुदाय अब भी पीछे हैं। इसी आधार पर आरक्षण नीति की समीक्षा की जरूरत बताई।
चिराग पासवान के रुख से बढ़ी एनडीए में बहस
दरअसल, इस विवाद के बीच चिराग पासवान एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर के प्रावधान को लेकर आपत्ति जता चुके हैं। उनका तर्क है कि आरक्षण की व्यवस्था आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, बहिष्करण और छुआछूत जैसी समस्याओं से निपटने के उद्देश्य से की गई थी।
चिराग पासवान ने क्रीमी लेयर की वकालत करने वालों से पहले इस्तीफा देने की बात भी कही थी। उनके इस रुख के बाद एनडीए के भीतर आरक्षण के मुद्दे पर अलग-अलग विचार सामने आने लगे हैं।
वहीं, जीतन राम मांझी लंबे समय से एससी समुदायों के भीतर सबसे अधिक वंचित वर्गों को अलग से लाभ पहुंचाने की बात करते रहे हैं। ऐसे में ‘कोटे में कोटा’ और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर मांझी-सुमन और चिराग पासवान के रुख को बिहार की दलित राजनीति में अहम माना जा रहा है।
‘हमारा संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं’
संतोष सुमन ने कहा कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति का उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि संविधान से मिले अधिकारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन व्यक्तिगत तिरस्कार और द्वेष की राजनीति उचित नहीं है।
अपने बयान के अंत में संतोष सुमन ने विरोधियों से सवाल करते हुए कहा कि पिछले दशकों में दलितों के लिए कितने भूमिहीन परिवारों को जमीन दी गई, कितनों को आवास मिला, कितने बच्चों को शिक्षा और पोशाक मिली और कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ा गया।
उन्होंने कहा, “हमने अपना हिसाब सामने रख दिया है। अब आपकी बारी है। भाषण का नहीं-काम का हिसाब दीजिए।”
आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सामने आए ये मतभेद आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति के साथ-साथ एनडीए के भीतर भी एक बड़े राजनीतिक विमर्श का आधार बन सकते हैं।


