
Albania: यूरोप के अल्बानिया में युवाओं का गुस्सा अब सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. राजधानी तिराना में छात्रों के नेतृत्व में हो रहे प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग उठ रही है. बेहतर शिक्षा और रोजगार की उम्मीद लेकर शुरू हुआ विरोध अब भ्रष्टाचार के आरोपों और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक आंदोलन का रूप ले चुका है.

विश्वविद्यालों की समस्याओं से शुरु हुआ विरोध
छात्रों की नाराजगी की एक बड़ी वजह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सुविधाओं की कमी, पढ़ाई का बढ़ता खर्च और सीमित रोजगार अवसर हैं. युवाओं का कहना है कि डिग्री हासिल करने के बाद भी अपने क्षेत्र में नौकरी पाना आसान नहीं है. लंबे समय से चली आ रही इन शिकायतों के बीच छात्र सड़कों पर उतरे और सरकार से जवाब मांगने लगे.
एक पर्यटन परियोजना ने भी बढ़ाया विवाद अल्बानिया में विरोध की एक अन्य वजह दक्षिणी तट पर प्रस्तावित लग्जरी पर्यटन परियोजना है, जिसका संबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर से बताया जाता है. इस परियोजना को लेकर पर्यावरण, जमीन के इस्तेमाल और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं. इसी मुद्दे के विरोध में पहले से चल रहे प्रदर्शनों को अब ‘फ्लेमिंगो आंदोलन’ के नाम से भी जाना जाता है.
प्रदर्शन के दौरान बिगड़े हालात

तिराना में प्रदर्शन के दौरान कई सरकारी इमारतों, दुकानों और बैंकों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया. हिंसक झड़पों में पुलिसकर्मी और अन्य लोग घायल हुए, जबकि कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. इन घटनाओं के बाद सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव और बढ़ गया.
वहीं, प्रधानमंत्री एडी रामा ने पद छोड़ने से इनकार करते हुए कहा है कि सरकार का फैसला लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए होना चाहिए. उन्होंने शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की इच्छा जताई, लेकिन हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का विरोध किया. दूसरी ओर, विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है और सरकार में बदलाव की मांग उठाई है.

अब आगे क्या होगा ?
अल्बानिया में जारी आंदोलन ने शिक्षा, मंहगाई, रोजगार और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों को एक साथ ला दिया है. देश यूरोपिय संघ की सदस्यता के लिए बातचीत आगे बढ़ा रहा है, ऐसे में राजनीतिक स्थिरता भी अहम है. फिलहाल प्रधानमंत्री अपने पद पर बने रहने के फैसले पर कायम हैं, जबकि प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं.


