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क्या जमशेदपुर के खौफनाक मंजर से सबक लेगा रामगढ़ प्रशासन?, यहां NH-33 पर किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा सिस्टम

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Digital Desk Naxatra Samachar: जमशेदपुर के मरीन ड्राइव पर आधी रात से खड़े एक खराब ट्रेलर ने जिस तरह चार होनहार छात्रों की सांसें छीन लीं, उसने पूरे झारखंड में सड़क सुरक्षा के दावों की कलई खोलकर रख दी है। झारखंड सरकार की मंत्री की बेटी समेत चार युवाओं की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई है कि अब निगाहें राज्य की सबसे व्यस्त जीवनरेखा यानी रांची-पटना NH-33 पर टिक गई हैं। रामगढ़ जिले से होकर गुजरने वाले इस फोरलेन पर दिन-रात हजारों भारी और हल्के वाहन रफ्तार भरते हैं। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि अगर इस तेज रफ्तार हाईवे पर कोई गाड़ी अचानक जवाब दे जाए, तो वह सीधे मौत का जाल बन जाती है। सवाल सिर्फ किसी गाड़ी के खराब होने का नहीं है, बल्कि सवाल उस लापरवाही का है जो एक बंद पड़े वाहन को काल बना देती है।

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अंधेरे में काल बनकर खड़े रहते हैं वाहन, संभलने का नहीं मिलता एक सेकंड

NH-33 पर गाड़ियां अमूमन 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती हैं। ऐसे में अगर सड़क के बीचों बीच या किनारे कोई भारी वाहन अचानक ब्रेकडाउन होकर खड़ा हो जाए, तो पीछे से आने वाले चालकों को ब्रेक लगाने या गाड़ी मोड़ने का जरा भी मौका नहीं मिलता। दिन के वक्त तो फिर भी रुकावट नजर आ जाती है, लेकिन असली खतरा ढलती शाम और रात के सन्नाटे में शुरू होता है। अक्सर देखा जाता है कि फोरलेन पर जब कोई ट्रक या ट्रेलर खराब होता है, तो चालक उसे भगवान भरोसे छोड़कर किनारे हट जाता है। न तो वाहन से 50-100 मीटर पहले कोई चेतावनी संकेत लगाया जाता है, न रिफ्लेक्टिव बैरिकेड होते हैं और न ही कोई लाल रिबन या इंडिकेटर। अंधेरे में तेज रफ्तार से आ रही गाड़ियों के लिए यह स्थिति सीधे मौत के मुंह में समा जाने जैसी होती है।

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जमशेदपुर कांड से सबक, खराब गाड़ी नहीं उसके इर्द-गिर्द का सन्नाटा है जानलेवा

जमशेदपुर में हुआ हादसा इस बात का जीता जागता सबूत है कि खराबी से ज्यादा घातक सिस्टम की सुस्ती होती है। वहां भी ट्रेलर रात 10 बजे से खराब पड़ा था और सुबह तड़के तक उसे सुरक्षित नहीं हटाया गया, जिसका नतीजा चार परिवारों के उजड़ने के रूप में सामने आया। रामगढ़ से गुजरने वाले फोरलेन पर भी अक्सर ऐसे नजारे आम हैं। सड़क सुरक्षा के तय नियमों के मुताबिक, जैसे ही हाईवे पर कोई गाड़ी खराब हो, पेट्रोलिंग टीम या एनएचएआई की क्रेन को तुरंत मौके पर पहुंचकर उसे सुरक्षित किनारे खींचना चाहिए। जब तक गाड़ी हटाई न जाए, तब तक उसके काफी पीछे रिफ्लेक्टिव कोन, लाल चेतावनी पट्टी और ब्लिंक करने वाली फ्लैशिंग लाइटें लगाई जानी अनिवार्य हैं, ताकि दूर से आ रहे ड्राइवर को खतरे का आभास हो सके।

पेट्रोलिंग, ब्लैक स्पॉट और स्ट्रीट लाइट, कब जागेगा जिम्मेदार महकमा

सड़क सुरक्षा सिर्फ कागजों पर सेमिनार करने से नहीं सुधरती, इसके लिए जमीन पर मुस्तैदी दिखानी होती है। रामगढ़ से गुजरने वाले इस बेहद संवेदनशील स्ट्रेच पर नियमित और सख्त पेट्रोलिंग की भारी दरकार है। हाईवे पर चिन्हित ब्लैक स्पॉट्स पर रोशनी के पुख्ता इंतजाम, पर्याप्त स्ट्रीट लाइटें, चमकने वाले कैट्स आई रिफ्लेक्टर और साफ दिखने वाले संकेतक बोर्ड होने चाहिए। अगर प्रशासन और हाईवे प्रबंधन ने समय रहते गश्त नहीं बढ़ाई और खराब गाड़ियों को लावारिस छोड़ने वालों पर कड़ा डंडा नहीं चलाया, तो किसी रात फिर कोई परिवार अपनी संतान को हमेशा के लिए खो देगा। वक्त रहते जागने की जरूरत है, क्योंकि हाईवे पर बरती गई एक छोटी सी ढिलाई किसी की पूरी जिंदगी लील जाती है।

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