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1995 में खरीदी जमीन, पर प्लॉट में निकल आया उर्दू स्कूल!, कांटाटोली के 12 साल पुराने जमीन विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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Ranchi News: रांची के कांटाटोली इलाके की एक विवादित जमीन को लेकर बीते करीब 12 साल से चल रही कानूनी लड़ाई में झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने शबाना खातून की याचिका खारिज करते हुए साफ कर दिया कि जिस जमीन पर एक तरफ निजी स्वामित्व का दावा है, वहीं दूसरी तरफ उर्दू स्कूल के संचालन का भी दावा है, ऐसे में स्कूल पक्ष को इस मुकदमे से अलग नहीं रखा जा सकता।

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कहां से शुरू हुआ यह विवाद?

यह मामला W.P. (C) No. 2328/2014 से जुड़ा है। शबाना खातून ने 24 फरवरी 2014 को निचली अदालत के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें पब्लिक उर्दू मिडिल स्कूल, कांटाटोली के अध्यक्ष मोहम्मद साबिर को टाइटल सूट संख्या 173/2011 में हस्तक्षेपकर्ता के तौर पर शामिल किए जाने की अनुमति दी गई थी। याचिकाकर्ता की दलील थी कि विवादित जमीन पर स्कूल अध्यक्ष का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, इसलिए उन्हें इस मुकदमे में हस्तक्षेप की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

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शबाना खातून ने पेश किए अपने दावे

अदालत में शबाना खातून की ओर से बताया गया कि उन्होंने यह विवादित जमीन साल 1995 में पंजीकृत बिक्री अभिलेख के जरिए खरीदी थी। उनके मुताबिक जमीन का म्यूटेशन उनके नाम पर हुआ और वे नियमित रूप से लगान व नगर निगम का टैक्स भी भरती रही हैं। उनका यह भी दावा था कि यह जमीन पहले किसी और के स्वामित्व में थी और विधिवत खरीद के बाद ही उन्हें इसका अधिकार मिला।

नगर निगम के दस्तावेजों ने बदला मामले का रुख

सुनवाई के दौरान रांची नगर निगम की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों ने इस पूरे विवाद को एक नया मोड़ दे दिया। निगम के रिकॉर्ड में एमएस प्लॉट संख्या 375 को नगर निगम की ही संपत्ति बताया गया है। इसके अलावा संबंधित होल्डिंग रद्द करने, म्यूटेशन निरस्त करने और निर्माण कार्य रोकने से जुड़े पत्र भी अदालत के सामने रखे गए। एक अन्य रिकॉर्ड में इसी प्लॉट पर उर्दू स्कूल के संचालन और जमीन के नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में होने का भी जिक्र मिला।

हाईकोर्ट ने क्यों जरूरी माना स्कूल पक्ष का शामिल होना?

न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने 21 सितंबर 2026 को अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड में इस जमीन को लेकर अलग-अलग तरह के दावे सामने आते हैं। एक तरफ निजी स्वामित्व और मकान होने का दावा है, तो वहीं दूसरी तरफ उसी प्लॉट के एक हिस्से पर स्कूल चलने की बात भी सामने आती है। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में स्कूल पक्ष को मुकदमे से बाहर रखकर विवाद का पूरा समाधान निकालना मुश्किल होगा। हाईकोर्ट ने इस दौरान विदुर इम्पेक्स एंड ट्रेडर्स बनाम टॉश अपार्टमेंट्स मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अगर किसी पक्ष की मौजूदगी से विवाद का व्यापक और प्रभावी समाधान संभव हो, तो उसे मुकदमे में उचित पक्षकार बनाया जा सकता है।

अंतिम फैसला अब निचली अदालत में

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया कि जमीन के असली स्वामित्व, कब्जे और स्कूल के संचालन से जुड़े अंतिम सवालों पर इस स्तर पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। यह जमीन किसके कब्जे में है और स्कूल वास्तव में कहां संचालित हो रहा है, इसका फैसला अब लंबित टाइटल सूट में पेश किए जाने वाले सबूतों के आधार पर निचली अदालत ही करेगी। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने पहले जारी अंतरिम आदेश को भी समाप्त कर दिया है, जिससे अब सभी पक्षों के लिए निचली अदालत में मुकदमे की आगे की सुनवाई में शामिल होने का रास्ता साफ हो गया है।

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