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SIR पर सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी से छिड़ी बहस, पूर्व CJI गवई को महुआ मोइत्रा ने कहा ‘चुप रहिए’

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SIR Controversy: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद अब न्यायपालिका से लेकर सियासी गलियारों तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की एक टिप्पणी पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने सवाल उठाए, तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने गवई पर तीखा हमला बोल दिया।
महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पूर्व CJI को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें अब चुप रहकर अपने रिटायरमेंट का आनंद लेना चाहिए। इस बयान के बाद SIR के साथ-साथ न्यायिक मर्यादा और न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

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महुआ मोइत्रा ने पूर्व CJI से कहा, ‘बस चुप हो जाइए’

महुआ मोइत्रा ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “मीलॉर्ड! आप चुप हो जाइए और रिटायरमेंट का आनंद लीजिए। बस चुप हो जाइए, प्लीज।” मोइत्रा ने अपनी पोस्ट में पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से जुड़े यौन उत्पीड़न आरोपों के मामले, पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के आवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूजा में भागीदारी और पूर्व न्यायाधीश अरुण मिश्रा द्वारा प्रधानमंत्री की प्रशंसा का भी उल्लेख किया। महुआ मोइत्रा ने सवाल उठाया कि इन घटनाओं के समय गवई ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति क्यों नहीं जताई। हालांकि, ये सवाल मोइत्रा की राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं।

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जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने SIR पर क्या कहा था?

विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी से हुई।
हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वीं जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में उन्होंने मताधिकार के महत्व पर अपनी बात रखी। जस्टिस भुइयां ने कहा कि लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ होगी। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्गों की कल्पना नहीं करता, जिनमें एक वर्ग को मतदान का अधिकार मिले और दूसरा इससे वंचित रह जाए।
उनकी इस टिप्पणी को SIR से जुड़े विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है।

पूर्व CJI गवई बोले, विचाराधीन मामले पर टिप्पणी उचित नहीं

जस्टिस भुइयां के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने न्यायिक मर्यादा का मुद्दा उठाया। गवई का कहना था कि जब कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हो, तो उसी अदालत के मौजूदा न्यायाधीश को उस विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि न्यायिक मर्यादा विचाराधीन मामले पर टिप्पणी करने की अनुमति नहीं देती। यह गवई की ओर से न्यायिक आचरण को लेकर व्यक्त किया गया दृष्टिकोण था।

दो पूर्व हाईकोर्ट जजों ने भी उठाए सवाल

पूर्व CJI गवई के अलावा दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस एसएन ढींगरा और जस्टिस आरएस सोढ़ी ने भी जस्टिस भुइयां की टिप्पणी पर सवाल उठाए।
दोनों पूर्व न्यायाधीशों ने विचाराधीन मामलों पर मौजूदा न्यायाधीशों की सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर गवई के रुख से सहमति जताई। इस विवाद में एक ओर नागरिकों के मताधिकार और संवैधानिक अधिकारों की चर्चा है, तो दूसरी ओर अदालत में लंबित मामलों पर न्यायाधीशों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की सीमाओं का सवाल उठ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं SIR से जुड़ी याचिकाएं

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं विचाराधीन हैं। इन मामलों में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े कानूनी सवाल उठाए गए हैं। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाला मामला भी न्यायिक विवाद का विषय रहा है। हालांकि, यह SIR से अलग कानूनी मुद्दा है। ऐसे में न्यायालय में लंबित मामलों पर अंतिम निर्णय आने से पहले किसी पक्ष की सार्वजनिक टिप्पणी को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

नालसार के छात्रों की भी हुई चर्चा

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने नालसार विश्वविद्यालय के छात्रों की मुखरता की भी सराहना की।
हाल में विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के संभावित प्रस्ताव का विरोध करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखा था। समारोह में जस्टिस भुइयां ने छात्रों को प्रतिभाशाली, मुखर और साहसी बताया। उन्होंने कहा कि छात्रों ने दिखाया है कि कानून के विद्यार्थियों को अपने विचार किस तरह व्यक्त करने चाहिए। फिलहाल SIR पर शुरू हुई यह बहस मताधिकार, न्यायिक मर्यादा और राजनीतिक अभिव्यक्ति जैसे कई महत्वपूर्ण सवालों तक पहुंच गई है।

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