
Ranchi: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की पुलिस व्यवस्था और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर पुलिस किसी आरोपी को उसकी गिरफ्तारी का लिखित आधार नहीं देती है, तो वह गिरफ्तारी पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक मानी जाएगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच बैठाई जाए और उनकी सर्विस बुक में प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के DGP को भेजी जाए, ताकि इसका सख्ती से पालन सुनिश्चित हो सके।

किस मामले में आया यह फैसला?
यह अहम आदेश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने शिरोमणि अकाली दल से जुड़े जसकरनजीत सिंह की याचिका पर सुनाया। वे पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। शीर्ष अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को इसलिए अवैध करार दिया, क्योंकि उन्हें गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए गए थे।

क्यों जरूरी है लिखित आधार?
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि आरोपी को गिरफ्तारी का आधार लिखित रूप में और उसकी समझ में आने वाली भाषा में देना एक मौलिक और वैधानिक अधिकार है। अगर संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन होता है, तो वह गिरफ्तारी असंवैधानिक मानी जाएगी और आरोपी को तुरंत रिहा करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह जमानत नहीं, बल्कि अवैध हिरासत से रिहाई का मामला है। अदालत ने यह भी कहा कि बाद में चार्जशीट दाखिल हो जाने या संज्ञान लिए जाने से पहले की अवैध गिरफ्तारी अपने आप वैध नहीं हो जाती, और यह नियम आईपीसी हो या कोई विशेष कानून, हर मामले पर समान रूप से लागू होगा। कोर्ट ने साफ कहा कि चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दोबारा गिरफ्तारी के लिए तय की गई सख्त प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया है कि अगर पुलिस किसी आरोपी को उसकी पहली अवैध गिरफ्तारी के बाद दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है, तो उसे एक बेहद सख्त प्रक्रिया से गुजरना होगा। सबसे पहले जांच एजेंसी को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देकर यह बताना होगा कि दोबारा गिरफ्तारी और हिरासत की आखिर जरूरत क्यों है। मजिस्ट्रेट के पास जाने से पहले इस आवेदन पर आरोपी अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी का अनुमोदन और हस्ताक्षर होना भी अनिवार्य होगा। इसके साथ ही वरिष्ठ अधिकारी को मामले की आगे की जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी, और नियमों का उल्लंघन करने वाले मूल जांच अधिकारी को इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर कर दिया जाएगा। वरिष्ठ अधिकारी को दोषी पाए गए अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश भी देने होंगे, और जांच में दोष साबित होने पर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सर्विस बुक में एंट्री दर्ज की जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया के बाद मजिस्ट्रेट दोनों पक्षों को सुनकर और पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही एक हफ्ते के भीतर दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति दे सकेंगे।
‘संविधान सर्वोपरि है’, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने साल 1974 के प्रसिद्ध मामले ‘प्रभु दयाल देवरा बनाम जिला मजिस्ट्रेट’ का हवाला देते हुए एक बेहद अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि समाज को होने वाला कोई भी नुकसान या अपराध की गंभीरता किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला करने का पर्याप्त कारण नहीं बन सकती, जब तक संविधान और कानून द्वारा तय प्रक्रिया का कड़ाई से पालन न किया गया हो। न्यायमूर्ति भुयान ने साफ शब्दों में कहा कि संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।


