
New Delhi: संभल हिंसा मामले के आरोपी मुल्ला अफरोज के खिलाफ लगाए गए प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। देश की शीर्ष अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार पर दस लाख रुपये की भारी कॉस्ट (जुर्माना) लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में दो टूक स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में आरोपी की ओर से दिए गए किसी कथित कबूलनामे को आधार बनाकर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का कानूनी आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती
गौरतलब है कि मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को अवैध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि हिरासत का फैसला संबंधित प्रशासनिक अधिकारी के सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री पर आधारित था। हाईकोर्ट के इस रुख के खिलाफ मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन यानी SLP दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने इस मामले पर विस्तृत सुनवाई की और 8 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

कथित कबूलनामे के दम पर NSA लगाने पर उठे तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस पूरी न्यायिक बहस का मूल बिंदु यही था कि क्या पुलिस अभिरक्षा के दौरान लिए गए कथित कबूलनामे के दम पर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनी जा सकती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यूपी सरकार और संभल के जिला मजिस्ट्रेट के रुख पर कड़े सवाल किए थे। अदालत ने माना कि पुलिसिया दबाव में दर्ज बयानों की कोई कानूनी स्वीकार्यता नहीं होती, इसलिए ऐसे बयानों पर प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसी असाधारण कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की थी संभल हिंसा
मुल्ला अफरोज को वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा में आरोपी बनाया गया था। उस दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा में चार लोगों की जान चली गई थी और इलाके में व्यापक तनाव फैल गया था। इसके बाद प्रशासन ने 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत मुल्ला अफरोज को हिरासत में ले लिया था। मुल्ला अफरोज का लगातार यह तर्क था कि घटना के समय उनका नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं था और बाद में केवल पुलिस हिरासत में लिए गए मनगढ़ंत बयानों के आधार पर उन्हें इस संवेदनशील मामले में फंसाकर हिरासत में भेज दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले ने प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग पर कड़ा संदेश दिया है।


