
New Delhi/Shriagar: श्रीनगर में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की शाम बेहद खास थी। रंग-बिरंगी रोशनी के बीच जब राष्ट्रगीत बजना शुरू हुआ, तो जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला अपनी जगह से उठ खड़े हुए। करीब छह अंतरों तक चले इस पूरे राष्ट्रीय गीत के दौरान दोनों नेता पूरे सम्मान के साथ खड़े रहे। देखने वालों के लिए यह एक सामान्य बात थी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस एक तस्वीर ने एक नई बहस को जन्म दे दिया।

पार्टी की अपनी सोच और सरकार का अलग नियम
इस पूरे घटनाक्रम पर जब बयानबाजी तेज हुई, तो मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपनी बात बेहद साफ शब्दों में सामने रखी। उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक दल के तौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कभी वंदे मातरम् को स्वीकार नहीं किया है और न ही आने वाले दिनों में ऐसा करेगी। हालांकि, जब बात सरकार चलाने और राज्य की जिम्मेदारी संभालने की आती है, तो नियम और कानून हर किसी के लिए एक जैसे हो जाते हैं।

कानून का पालन करना सबकी मजबूरी
उमर अब्दुल्ला ने स्थिति साफ करते हुए बताया कि राष्ट्रीय गीत को लेकर देश में बाकायदा कानून बना हुआ है। सरकारी आयोजनों में वंदे मातरम् के सभी अंतरों को बजाना अनिवार्य किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में हर सरकारी कार्यक्रम के लिए यही नियम लागू होता है। सरकारी पदों पर बैठे लोगों को इन कायदों का पालन करना ही पड़ता है और ऐसा न करने पर कार्रवाई भी हो सकती है।
गठबंधन के सहयोगियों के बीच अलग-अलग सुर
यह पूरी बहस उस वक्त और दिलचस्प हो गई जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने 1937 में स्वीकृत गीत के रूप का हवाला देते हुए कहा था कि पूरा संस्करण देश की साझी संस्कृति से मेल नहीं खाता। लेकिन दूसरी तरफ, श्रीनगर में उमर अब्दुल्ला का नियम का पालन करते हुए खड़े रहना यह दिखाता है कि इस मुद्दे पर गठबंधन के साथियों की अपनी-अपनी राय है। एक तरफ जहां पार्टी की अपनी अलग विचारधारा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार में रहते हुए नियमों का मान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है।


