
New Delhi: 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में छात्रों और सामाजिक संगठनों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस व अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई तथा प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर हिरासत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को छुट्टी के दिन विशेष सुनवाई की। जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने राजधानी में लगाई गई कड़ी पाबंदियों पर सख्त रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि जब तक बेहद जरूरी न हो, शहर भर से सभी बैरिकेड्स तुरंत हटाए जाएं। अदालत ने साफ किया कि कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए तय नियमों के तहत आम नागरिकों की निर्बाध आवाजाही को जल्द से जल्द सामान्य किया जाना चाहिए।

मेट्रो स्टेशन बंद करने और ट्रेनें रोकने के खिलाफ दायर थी याचिका
सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्त टिप्पणी वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर अवमानना याचिका पर आई है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के उस आदेश का हवाला दिया गया था, जो प्रदर्शनों के मद्देनजर दिल्ली के 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और राजधानी आने वाली ट्रेनों को रद्द किए जाने के खिलाफ दिया गया था। सुनवाई की शुरुआत में जब वकीलों ने रविवार को विशेष सुनवाई के लिए पीठ का आभार जताया, तो जस्टिस बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा, “धन्यवाद देने की कोई आवश्यकता नहीं है, हम सदैव देश की सेवा में उपस्थित हैं।”

प्रदर्शन का अधिकार पर पुलिस एक्ट के दायरे में: पीठ
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का पूरा मौलिक अधिकार है और इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। हालांकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि प्रदर्शन करने का यह अधिकार पुलिस अधिनियम (Police Act) के नियमों और तय कानूनी दायरे के भीतर ही होना चाहिए। इसके साथ ही, प्रदर्शनकारियों की व्यापक स्तर पर धरपकड़ और शहर के बिगड़े हालात को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और दिल्ली मेट्रो रेल निगम (DMRC) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
कपिल सिब्बल और शदान फरासत ने रखीं तीखी दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने निषेधाज्ञा (धारा 163) और मनमानी हिरासत को चुनौती देते हुए कहा कि पुलिस लोगों को ट्रेनों से जबरन उतारकर हिरासत में ले रही है। उन्होंने इंटरनेट निलंबन पर सवाल उठाते हुए ऐतिहासिक ‘अनुराधा भसीन मामले’ के फैसले का हवाला दिया। वहीं, वरिष्ठ वकील शदान फरासत ने प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसिया दुर्व्यवहार का ब्योरा देते हुए आरोप लगाया कि निहत्थे छात्रों और बच्चों को बेरहमी से पीटा गया, बसों में घसीटा गया और फिर बाहर फेंका गया। वरिष्ठ वकील एन. हरिशरण ने भी अदालत से कहा कि सुरक्षा के नाम पर राजधानी में आम नागरिकों की स्वतंत्रता और आवागमन के अधिकार को पूरी तरह छीन लिया गया है।


