
Giridih: गिरिडीह सदर अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाओं के बदहाल हालात को लेकर युवा अधिवक्ता संदीप यादव का गुस्सा फूट पड़ा है। अस्पताल में पिछले एक साल से बंद पड़ी अल्ट्रासाउंड सेवा, जरूरी दवाओं की भारी किल्लत और गंदगी के मुद्दे पर वे रविवार से झंडा मैदान में आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। भूख हड़ताल के दूसरे दिन देर रात उनके कई साथी वकील भी झंडा मैदान पहुंचे और उनके स्वास्थ्य का हाल जाना। फिलहाल संदीप यादव की तबीयत स्थिर बताई जा रही है, लेकिन बिना कुछ खाए-पिए लगातार डटे रहने से आगे चलकर उनकी सेहत बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।

अब तक मिलने नहीं पहुंचा कोई प्रशासनिक अफसर
संदीप यादव का सीधा आरोप है कि दो दिनों से वे खुले आसमान के नीचे अनशन पर हैं, लेकिन अब तक जिले का कोई भी प्रशासनिक या स्वास्थ्य विभाग का अधिकारी उनकी सुध लेने तक नहीं पहुंचा है। गिरिडीह डीसी रामनिवास यादव और स्वास्थ्य विभाग की इस बेरुखी से आंदोलनकारियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। अपनी मांगों को लेकर वे झंडा मैदान को ही अपना ठिकाना बनाए हुए हैं और साफ कह चुके हैं कि जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

सालभर से बंद है अल्ट्रासाउंड, भटक रहे गरीब मरीज
संदीप यादव ने बताया कि सदर अस्पताल जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, जहां रोज हजारों गरीब और जरूरतमंद लोग इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। इसके बावजूद पिछले एक साल से यहां की अल्ट्रासाउंड मशीन धूल फांक रही है। मरीजों को न तो पूरी दवाएं मिल पाती हैं और न ही परिसर में सफाई की समुचित व्यवस्था है। गरीब मरीजों को बाहर निजी सेंटरों में महंगे दामों पर जांच करानी पड़ रही है, जो उनके बस की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में वे डीसी रामनिवास यादव और सिविल सर्जन डॉक्टर बबन सिंह को कई बार लिखित शिकायत दे चुके हैं, लेकिन अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
मंत्रियों के वादे भी निकले खोखले
अनशनकारी अधिवक्ता ने याद दिलाया कि कुछ महीने पहले जब राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और तत्कालीन मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू सदर अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे थे, तब भी उन्हें इस समस्या से रूबरू कराया गया था। उस दौरान मंत्रियों ने जल्द से जल्द अल्ट्रासाउंड सेवा बहाल करने का भरोसा दिलाया था। इसके बावजूद छह महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया और हालात जस के तस बने रहे। संदीप यादव का कहना है कि जब सरकार और अधिकारियों के सारे वादे झूठे साबित हो गए, तब मजबूर होकर उन्हें जनता के हक में इस तरह अनशन का रास्ता चुनना पड़ा।


