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कपड़े उतारकर क्यों मनाते हैं त्योहार?, जानिए कौन हैं ‘Naturist’ ; बिना कपड़ों के रहने वाले लोगों का इतिहास जानकर रह जाएंगे हैरान

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Naturist lifestyle: दुनिया भर में ऐसे लाखों लोग हैं जो मानते हैं कि इंसान का शरीर किसी शर्म, संकोच या झिझक का कारण नहीं होना चाहिए। ऐसे विचार रखने वाले लोगों को ‘नैचुरिस्ट’ (Naturist) या प्रकृतिवादी कहा जाता है। इनका मानना है कि इंसानी शरीर को भी उसी सहजता से स्वीकार किया जाना चाहिए जैसे हम प्रकृति की अन्य चीजों को स्वीकार करते हैं। इसी सोच के तहत वे खास स्थानों और निजी आयोजनों में बिना कपड़ों के समय बिताना पसंद करते हैं। हालांकि, आम लोग अक्सर इसे अश्लीलता से जोड़कर देखते हैं, जबकि यह समुदाय इसे एक सामाजिक और मानसिक आजादी से जुड़ी जीवनशैली मानता है।

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कपड़े न पहनने के पीछे क्या है सोच?

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नैचुरिस्ट लोगों का तर्क है कि कपड़े पहनना सिर्फ मौसम या जरूरत की चीज है, इंसान की असली पहचान नहीं। समाज में कपड़े अक्सर अमीरी-गरीबी, ओहदे और सामाजिक भेदभाव को दर्शाते हैं, जबकि बिना कपड़ों के हर इंसान एक समान नजर आता है। यही समानता उन्हें इस जीवनशैली की तरफ आकर्षित करती है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में ‘ब्रिटिश नेचुरिज्म’ नाम के समूह ने बिना कपड़ों के क्रिसमस लंच का आयोजन किया था। वहां शामिल लोगों का कहना था कि ऐसे माहौल में कोई किसी को उसके कपड़ों या स्टेटस से जज नहीं करता, जिससे वे ज्यादा सुकून और आजादी महसूस करते हैं।

क्या 24 घंटे बिना कपड़ों के रहते हैं ये लोग?

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प्रकृतिवाद को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही है कि लोग सोचते हैं कि ये लोग हमेशा बिना कपड़ों के ही रहते हैं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। ज्यादातर नैचुरिस्ट सामान्य जीवन में बाकी लोगों की तरह ही कपड़े पहनते हैं, नौकरियां करते हैं, बाजार जाते हैं और परिवार के साथ रहते हैं। वे केवल पंजीकृत क्लबों, रिसॉर्ट्स, तय समुद्र तटों (Nude Beaches) या निजी कार्यक्रमों में ही इस जीवनशैली को अपनाते हैं। ऐसे आयोजनों में बॉडी शेमिंग या भद्दे कमेंट्स के बिना लोग एक-दूसरे के साथ बेहद सम्मानजनक और सहज व्यवहार करते हैं।

नैचुरिस्ट क्लबों में क्या-क्या गतिविधियां होती हैं?

ऐसे आयोजनों को लेकर कई तरह के भ्रम फैले रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां बेहद सामान्य और स्वस्थ माहौल होता है। लोग आम पर्यटकों की तरह स्विमिंग, योग, खेल और कैंपिंग करते हैं। इन आयोजनों में परिवार और बच्चे भी हिस्सा लेते हैं। खुली हवा, प्राकृतिक धूप और बिना किसी जजमेंट के समय बिताने से लोगों का मानसिक तनाव कम होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और शरीर को लेकर मन की झिझक खत्म होती है।

1891 में भारत के माथेरान में बना था पहला क्लब

आधुनिक नैचुरिज्म आंदोलन की शुरुआत 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में यूरोप में हुई थी, जब तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और प्रदूषण से दूर लोग प्रकृति के करीब लौटने लगे। लेकिन इस इतिहास का सबसे दिलचस्प पहलू भारत से जुड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया का पहला संगठित नैचुरिस्ट क्लब साल 1891 में भारत के महाराष्ट्र स्थित माथेरान में बना था, जिसका नाम ‘फेलोशिप ऑफ द नेकेड ट्रस्ट’ (Fellowship of the Naked Trust) था। बाद में जर्मनी के ‘फ्री बॉडी कल्चर’ आंदोलन ने इसे वैश्विक पहचान दी और आज फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ऐसे दर्जनों रिसॉर्ट और क्लब संचालित हो रहे हैं।

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