
Giridih: सरकार और सिस्टम की घोर अनदेखी के आगे जब प्रशासनिक उम्मीदें टूट गईं, तो ग्रामीणों ने खुद ही अपने गांव की तकदीर बदलने की ठान ली। गिरिडीह जिले के बगोदर प्रखंड अंतर्गत लुकुइया ठाकुर टोला से जमुवारी के बीच स्थित वर्षों से बदहाल सड़क को दुरुस्त करने के लिए अब ग्रामीण खुद आगे आए हैं। वर्षों से उपेक्षा का दंश झेल रही इस कच्ची और पथरीली सड़क पर जब प्रशासन का कोई नुमाइंदा नहीं पहुंचा, तो ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और चंदा इकट्ठा कर सड़क को चलने लायक बनाने का बीड़ा उठा लिया है।

बरसात में दलदल बन जाता था मार्ग, बच्चों और मरीजों की फजीहत
लुकुइया ठाकुर टोला से जमुवारी को जोड़ने वाला यह मुख्य संपर्क मार्ग दशकों से बुनियादी निर्माण की बाट जोह रहा है। मानसून के दिनों में इस सड़क की स्थिति बद से बदतर हो जाती है। जगह-जगह बने बड़े-बड़े गड्ढों में पानी भर जाने से यह मार्ग पूरी तरह दलदल में तब्दील हो जाता है, जिससे होकर पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। सबसे ज्यादा फजीहत स्कूल जाने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चों, बुजुर्गों और बीमार मरीजों को उठानी पड़ती है। कई बार मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते, जिससे ग्रामीणों का गुस्सा चरम पर पहुंच गया।

नेताओं और अधिकारियों के दफ्तरों के काटे चक्कर, मिला सिर्फ आश्वासन
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पक्की सड़क के निर्माण को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक को दर्जनों बार लिखित पत्राचार किया। प्रखंड कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय तक चक्कर काटे, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासनों के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ। जब व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ गया, तो ग्रामीणों ने एकजुट होकर अपनी समस्या का खुद समाधान निकालने का निर्णय लिया।
त्योहारों को देखते हुए खुद बने मजदूर, बोल्डर डालकर गड्ढे भर रहे ग्रामीण
शारदीय नवरात्र और दुर्गापूजा समेत आगामी पर्व-त्योहारों के मद्देनजर ग्रामीणों ने घर-घर से चंदा एकत्र किया। इसके बाद ट्रैक्टरों से बोल्डर, गिट्टी और मिट्टी मंगाकर सड़क के खतरनाक गड्ढों को पाटने का काम युद्धस्तर पर शुरू किया गया। गांव के युवा और बुजुर्ग किसी पेशेवर मजदूर की तरह खुद कुदाल और तगाड़ी लेकर पसीना बहा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि त्योहारों में बाहर से आने वाले परिजनों और पूजा पंडालों तक जाने वाले श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो, इसी उद्देश्य से वे दिन-रात एक करके इस मार्ग को सुगम बनाने में जुटे हैं। ग्रामीणों का यह स्वावलंबन जहां मिसाल बना हुआ है, वहीं स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है।


