
Ranchi: 21वीं सदी के भारत में यदि समाज अंधविश्वास और छद्म विज्ञान यानी स्यूडोसाइंस के भंवर में फंसा रहेगा, तो प्रगति की रफ्तार थमना तय है। दुनिया का इतिहास स्पष्ट करता है कि वही देश वैश्विक पटल पर शीर्ष पर पहुंचे हैं, जिन्होंने तर्क, साक्ष्य और विज्ञान को प्राथमिकता दी है। वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने और अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए समाज से रूढ़िवादिता और अंधविश्वास को जड़ से मिटाना होगा। इसी कड़ी में विज्ञान को केवल किताबों तक सीमित न रखकर रोजमर्रा के जीवन में उतारने की दिशा में एक सशक्त पहल की गई है।

JVM श्यामली में कार्यशाला, अतिथियों ने किया दीप प्रज्वलन
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE के तत्वावधान में जवाहर विद्या मंदिर, श्यामली में शिक्षकों के लिए एक दिवसीय इन-हाउस प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यशाला का केंद्रीय विषय ‘साइंटिफिक टेंपरामेंट’ यानी वैज्ञानिक दृष्टिकोण रहा। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस दौरान उप प्राचार्या अनुपमा श्रीवास्तव, स्कूल समन्वयक सुष्मिता मिश्रा, विद्यालय प्रशिक्षण नोडल अधिकारी इंद्रजीत कुमार, मुख्य वक्ता सोमेन डे, माध्यमिक प्रभाग प्रभारी शीलेश्वर झा सुशील, प्राथमिक प्रभाग प्रभारी दीपक सिन्हा और ममता दास मुख्य रूप से मौजूद रहीं।

70 शिक्षकों ने लिया भाग, 8 मॉड्यूल्स पर 5 घंटे चला मैराथन सत्र
CBSE की इस विशेष ट्रेनिंग में विद्यालय के सत्तर प्रशिक्षु शिक्षकों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। पांच घंटे तक चले इस मैराथन सत्र में मुख्य वक्ता सोमेन डे ने आठ महत्वपूर्ण मॉड्यूल्स पर विस्तार से चर्चा की। सत्र का आरंभ प्राचीन भारत की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत के उल्लेख के साथ हुआ। इसके बाद समाज में पैठ बना चुके अंधविश्वास और छद्म विज्ञान के खतरों का बेबाक विश्लेषण किया गया। शिक्षकों को क्रिटिकल थिंकिंग के गुर सिखाए गए, ताकि हर सूचना को साक्ष्य की कसौटी पर परखा जा सके। कार्यशाला को केवल व्याख्यान तक सीमित न रखकर ऑडियो, वीडियो, प्रयोगात्मक गतिविधियों और रोचक क्विज के जरिए बेहद जीवंत बनाया गया।
हर विषय में तार्किक नजरिया जरूरी, सवाल पूछने से आएगी क्रांति
विद्यालय के प्रशिक्षण नोडल अधिकारी इंद्रजीत कुमार ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण सिर्फ प्रयोगशाला या नए आविष्कारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक अर्थ हर विषय को तार्किक ढंग से पढ़ना और समझना है। उन्होंने कहा कि जब तक बच्चों में शुरुआती उम्र से ही तार्किक सोच की आदत नहीं डाली जाएगी, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। जब बच्चे सवाल पूछने की हिम्मत जुटाएंगे, तभी देश में वास्तविक बौद्धिक क्रांति संभव होगी।
शिक्षकों के कंधों पर वैज्ञानिक चेतना जगाने की जिम्मेदारी
उप प्राचार्या अनुपमा श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान बांटने वाले नहीं, बल्कि समाज की सोच को दिशा देने वाले शिल्पकार हैं। इस पांच घंटे के प्रशिक्षण की सार्थकता तभी है, जब शिक्षक इसे अपनी कक्षाओं में लागू करें। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के मन से भ्रम और डर को निकालकर उनमें जिज्ञासा और वैज्ञानिक चेतना का बीजारोपण करना होगा। कार्यशाला के अंत में सभी शिक्षकों ने इस वैज्ञानिक सोच और व्यावहारिक शिक्षण शैली को अपनी कक्षाओं में पूरी निष्ठा से उतारने का संकल्प लिया।


