
Digital Desk Naxatra: तेरह लंबे साल, हर आहट पर दरवाजे की ओर उठती बूढ़ी निगाहें और सीने में दबा यह अटूट विश्वास कि उनका बेटा एक दिन जरूर लौटेगा। दुमका जिले के जामा प्रखंड स्थित रेंगनी गांव की एक टूटी झोपड़ी में बरसों से चल रहा यह दर्दनाक इंतजार आखिरकार खत्म हो गया। गरीबी, मुफलिसी और अशिक्षा के अंधेरे में करीब 13 साल पहले घर की दहलीज लांघकर लापता हुआ अनिल अब अपने मां-बाप की बांहों में है। एक मां की ममता और पिता के सब्र की ऐसी जीत हुई, जिसने पूरे इलाके की आंखें नम कर दीं।

फेसबुक की एक पोस्ट ने बदल दी तकदीर
अनिल जब घर से निकला था तो किसी को अंदाजा नहीं था कि वह किस दिशा में चला गया। बरसों तक कोई सुराग नहीं मिला, लेकिन सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल ने एक बिखरे परिवार को नई जिंदगी दे दी। जामा क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता विजय कापरी ने अनिल की तस्वीर और उसकी गुमशुदगी की पूरी कहानी फेसबुक पर साझा की थी। यह पोस्ट धीरे-धीरे हजारों लोगों तक पहुंची और इसी की बदौलत यह सुखद खबर सामने आई कि अनिल बिल्कुल सुरक्षित है और मुंबई के एक आश्रम में रह रहा है।

मुखिया बने मसीहा, माता-पिता को लेकर पहुंचे मुंबई
जैसे ही बेटे के जिंदा होने की खबर घर पहुंची, बेहाल माता-पिता के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। गरीबी इतनी थी कि मुंबई तक का सफर तय करना उनके बस की बात नहीं थी। ऐसे में सरसाबाद पंचायत के मुखिया राजू पूजहर देवदूत बनकर सामने आए। उन्होंने तुरंत मुंबई के आश्रम प्रबंधन से बातचीत की और कागजात तैयार कराए। इसके बाद मुखिया खुद अपने खर्च और देखरेख में अनिल के माता-पिता को लेकर मुंबई पहुंचे।
13 साल बाद सीने से लगाया तो छलक पड़े आंसू
मुंबई के आश्रम में जब 13 साल बाद आमना-सामना हुआ, तो उस भावुक दृश्य को देखकर वहां मौजूद हर शख्स का दिल भर आया। इतने सालों बाद अपने लाल को सामने देख मां-बाप फफक कर रो पड़े और अनिल भी उनके पैरों से लिपट गया। आश्रम प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और अब परिजन अनिल को साथ लेकर अपने पैतृक गांव रेंगनी लौटने की तैयारी में हैं।
पलायन और लाचारी पर सिस्टम से कड़े सवाल
यह कहानी जहां सोशल मीडिया की ताकत और मानवीय संवेदना की मिसाल है, वहीं हमारे सामाजिक ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। सुदूर गांवों में फैली घोर गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव आज भी नौजवानों को ऐसे मोड़ पर लाकर छोड़ देता है जहां से वापसी मुश्किल हो जाती है। सिर्फ जागरूकता और संपर्क साधनों की समझ न होने के कारण एक परिवार को अपने ही खून से 13 साल तक दूर रहना पड़ा। यह घटना चीख-चीख कर याद दिलाती है कि ग्रामीण इलाकों में पलायन रोकने और बुनियादी जागरूकता फैलाने की दिशा में सिस्टम को अभी बहुत कुछ करना बाकी है।


