
Ranchi: अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत की शरण में जाने वाले कर्मचारियों के हक में झारखंड हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि न्याय की गुहार लगाने वाले कर्मचारियों को प्रताड़ित करना या उनके खिलाफ दंडात्मक कदम उठाना पूरी तरह से असंवैधानिक है। जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने धरो उरांव एवं अन्य संविदा कर्मियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उनके नियमितीकरण के दावे को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय मांगना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसके प्रतिशोध में की गई प्रशासनिक कार्रवाई कानून के शासन पर सीधा प्रहार है।

2004 से दे रहे थे सेवा, विभाग विलय के बाद अचानक निकाला गया
यह पूरा मामला स्वास्थ्य विभाग के अभियंत्रण कोषांग से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता वर्ष 2004-2005 से लगातार विभाग में अपनी सेवाएं निष्ठापूर्वक दे रहे थे। हालांकि वर्ष 2016 में विभाग के पुनर्गठन और विलय की प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व औपचारिक नोटिस के उन्हें अचानक सेवा से बाहर कर दिया था। इसके बाद कर्मचारियों ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। पूर्व में अदालत से राहत मिलने और राज्य सरकार की अपील खारिज होने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने अड़ियल रवैया बरकरार रखा और 14 अगस्त 2024 को एक आदेश जारी कर उनके नियमितीकरण के दावे को दोबारा ठुकरा दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला और 6 सप्ताह में बहाली का निर्देश
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण और नज़ीर बनने वाले फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने राज्य सरकार के तमाम तर्कों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट किया कि वर्षों तक लगातार काम करने वाले कर्मचारियों को महज ‘संविदा’ का ठप्पा लगाकर उनके जायज अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को कड़ा निर्देश दिया है कि वह सभी याचिकाकर्ताओं को छह सप्ताह के भीतर समस्त परिणामी लाभों के साथ सेवा में वापस बहाल करे और उनके नियमितीकरण का औपचारिक आदेश जारी करे।


