
Ranchi/Giridih: दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के असमय निधन के बाद गिरिडीह विधानसभा सीट रिक्त घोषित हो चुकी है, जिसके बाद अब क्षेत्र में प्रशासनिक तैयारियों के साथ-साथ राजनीतिक हलचल भी काफी तेज हो गई है। राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी द्वारा भारत निर्वाचन आयोग को भेजी गई औपचारिक अनुशंसा के बाद माना जा रहा है कि जिला प्रशासन बहुत जल्द उपचुनाव की व्यावहारिक तैयारियों में जुट जाएगा। संवैधानिक नियमों के तहत आगामी पांच महीनों के भीतर निर्वाचन की घोषणा होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। प्रशासनिक इतिहास के नजरिए से भी यह चुनाव बेहद खास है, क्योंकि पृथक जिला बनने के बाद गिरिडीह पहली बार किसी विधानसभा उपचुनाव का सामना करने जा रहा है।

नई मतदाता सूची के आधार पर तय होगा चुनावी गणित
उपचुनाव के सुचारू आयोजन से पहले प्रशासनिक स्तर पर मतदाता सूची को अद्यतन करने का कार्य युद्धस्तर पर जारी है। वर्तमान में चल रही एसआईआर (विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण) की प्रक्रिया आगामी 30 सितंबर तक पूरी कर ली जाएगी। इस प्रक्रिया के पूर्ण होते ही गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र की अंतिम और संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी, जिसके आधार पर ही उपचुनाव में मतदान कराया जाएगा। एसआईआर की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद आने वाले कुछ ही दिनों में यह आंकड़े पूरी तरह साफ हो जाएंगे कि इस बार क्षेत्र में कुल कितने मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने के पात्र होंगे।

श्वेता शर्मा की राजनीतिक चुनौती और सहानुभूति का समीकरण
प्रशासनिक तैयारियों के बीच राजनीतिक मोर्चे पर भी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी श्वेता शर्मा का हेमंत सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, मंत्री पद संभालने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उपचुनाव जीतकर अपनी सीट बचाने की होगी। अब तक घरेलू जीवन व्यतीत करने वाली और राजनीति से दूरी बनाकर रखने वाली श्वेता शर्मा का चुनाव मैदान में उतरना मुख्य रूप से सहानुभूति लहर पर निर्भर करेगा। श्वेता शर्मा के मैदान में आने के बाद सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा और पूरी हेमंत सरकार इस सीट को बरकरार रखने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देगी।
भाजपा में दावेदारों की कतार और पूर्व विधायक का मजबूत जनाधार
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी इस उपचुनाव में जीत दर्ज कर वापसी की रणनीति बना रही है। चर्चा है कि भाजपा एक बार फिर अपने पूर्व विधायक और पुराने चेहरे निर्भय शाहबादी पर दांव खेल सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में निर्भय शाहबादी कड़े मुकाबले में महज 3500 मतों के सूक्ष्म अंतर से ही पराजित हुए थे। सामाजिक स्तर पर स्वर्ण और पिछड़ी जातियों के बीच समन्वय बिठाकर मतदाताओं को गोलबंद करने में उनका प्रभाव पिछले दो चुनावों में साबित हो चुका है। इसके अतिरिक्त, हाल ही में उनकी पत्नी प्रभा शाहबादी के निधन के कारण स्थानीय स्तर पर उनके प्रति भी सहानुभूति का माहौल देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा के भीतर सुरेश साहू, विनय सिंह, सांसद प्रतिनिधि दिनेश यादव और चुन्नुकांत जैसे कई अन्य दावेदार भी टिकट की रेस में शामिल हैं, लेकिन अंतिम फैसला निर्भय शाहबादी के पिछले जनाधार और समीकरणों को ध्यान में रखकर ही लिया जा सकता है।


