
Teacher murder case: दिल्ली की एक अदालत ने अपने ही स्कूल में शिक्षक की बेरहमी से हत्या करने वाले 28 वर्षीय दोषी को फांसी की सजा देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने माना कि गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्ते को तार-तार करने वाली यह हत्या बेहद संगीन और घिनौनी थी, लेकिन वारदात के वक्त दोषी की उम्र महज 18 साल सात महीने थी। तीस हजारी कोर्ट की एडिशनल सेशन जज प्रिया महेंद्र ने फैसला सुनाते हुए कहा कि उस कच्ची उम्र में इंसान के दिमाग की मानसिक क्षमताएं किसी पूरी तरह विकसित वयस्क की तरह परिपक्व नहीं होती हैं। अदालत ने आरोपी को दोषी करार देने के बाद अब फांसी के बजाय उम्रकैद की सजा सुनाई है।

प्रॉसिक्यूशन ने मांगी फांसी, दूसरी हत्या और जेल में बदसलूकी का दिया हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने हत्या को पूरी तरह सोची-समझी साजिश बताते हुए दोषी के लिए सख्त से सख्त यानी मौत की सजा की मांग की थी। एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर कमाल अख्तर ने दलील दी कि आरोपी के मन में अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। सरकारी वकील ने अदालत के सामने यह बात भी रखी कि कोविड महामारी के दौरान अंतरिम जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी एक अन्य हत्या के मामले में भी शामिल पाया गया था। इसके अलावा जेल के अंदर भी उसने नियमों का उल्लंघन किया और साथी कैदियों के साथ मारपीट की, इसलिए वह किसी रियायत का हकदार नहीं है।

बचाव पक्ष का तर्क: सुधार का मौका जरूरी, दूसरे केस में भी नहीं था मुख्य हमलावर
दूसरी तरफ दोषी के वकील ने फांसी की सजा का कड़ा विरोध करते हुए उसकी कम उम्र को मुख्य आधार बनाया। बचाव पक्ष ने कहा कि अपराध के वक्त आरोपी किशोरावस्था की दहलीज पर था और लगभग नौ साल लंबे चले ट्रायल के दौरान वह लगातार न्यायिक हिरासत में रहा है। वकील ने दलील दी कि उसमें अब भी सुधार और पुनर्वास की पूरी गुंजाइश बाकी है। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज दूसरे हत्या के मामले पर भी विचार किया और पाया कि उस वारदात में आरोपी ने खुद चाकू नहीं मारा था, बल्कि केवल उकसाने का आरोप था और उस मामले में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
उम्रकैद के साथ जुर्माना, सभी सजाएं एक साथ चलेंगी
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि न्याय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ-साथ अपराधी की उम्र और परिस्थितियों पर भी ध्यान देना जरूरी है। जज ने कहा कि भले ही यह घटना सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं के खिलाफ एक बड़ा अपराध है, लेकिन कम उम्र के पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोषी को हत्या के जुर्म में उम्रकैद और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, जो मृतक शिक्षक के कानूनी वारिसों को मुआवजे के तौर पर दी जाएगी। जुर्माना न भरने पर छह महीने की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी। इसके साथ ही सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने और बल प्रयोग करने के मामलों में भी अलग-अलग कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई है, जो उम्रकैद के साथ ही एक साथ चलेंगी।


