
Ranchi: करीब 36 साल पुराने एक बहुचर्चित गोलीकांड मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी लक्ष्मीकांत दास को बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) की ओर से दी गई 7 वर्ष की सजा में संशोधन करते हुए मामले को आईपीसी की धारा 324/34 के तहत माना। इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी द्वारा जेल में बिताई गई 5 माह 15 दिन की अवधि को ही पर्याप्त सजा मानते हुए फैसला सुनाया। पर्याप्त सबूत न होने के कारण कोर्ट ने आरोपी को आर्म्स एक्ट की धारा 27 के आरोपों से बरी कर दिया है।

बाउंड्री निर्माण के विवाद में हुई थी फायरिंग
यह मामला 13 जून 1990 का है। सरायकेला थाना क्षेत्र के घाघी गांव में घासीराम महतो और उनके भाई कंद्रू महतो अपनी जमीन पर बाउंड्री का काम करवा रहे थे। इसी दौरान लक्ष्मीकांत दास, अमूल्य कुमार दास और ज्ञानी दास वहां पहुंचे और काम रोकने को कहा। विवाद बढ़ने पर पहले तीर चलाया गया और फिर बंदूक से फायरिंग की गई, जिसमें छर्रे लगने से तीन लोग घायल हो गए थे।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 7 साल की सजा
सरायकेला थाना कांड संख्या 41/1990 के तहत चली सुनवाई में ट्रायल कोर्ट ने 16 अप्रैल 2003 को लक्ष्मीकांत दास को धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत 7 साल और आर्म्स एक्ट में 3 साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए लक्ष्मीकांत दास ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।
सबूतों के अभाव में कोर्ट ने बदला फैसला
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि मामले में जांच अधिकारी (I.O.) को गवाही के लिए कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया था। इसके अलावा घायलों की इंजरी रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थी, जिससे चोट की गंभीरता स्पष्ट नहीं हो सकी। घटनास्थल से खाली कारतूस या छर्रे बरामद नहीं होने और ठोस बैलिस्टिक रिपोर्ट न होने के कारण कोर्ट ने धारा 307 को हटाकर मामला धारा 324/34 में माना और आर्म्स एक्ट से आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया।
साढ़े तीन दशक बाद मिली कानूनी राहत
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि घटना साल 1990 की है और आरोपी पिछले साढ़े तीन दशक से कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहा है। चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, इसलिए कोर्ट ने उसकी भुगती गई 5 महीने 15 दिन की हिरासत को ही पर्याप्त सजा मानते हुए उसे जमानत बॉन्ड से भी मुक्त कर दिया।


