
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा है कि यदि कोई भी नागरिक अपने कानूनी या संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्याय की चौखट खटखटाता है, तो उसे केवल इसी आधार पर नौकरी से हटाना या किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई का शिकार बनाना पूरी तरह गैर-कानूनी है। हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा रवैया कानून के शासन की मूल आत्मा पर सीधा प्रहार करता है।

हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के इंजीनियरिंग सेल में कार्यरत संविदा कर्मियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया है।

10 वर्षों से दे रहे थे सेवा, कोर्ट जाते ही मौखिक बर्खास्तगी
याचिका दाखिल करने वाले सभी कर्मचारी क्लर्क, टाइपिस्ट, समन्वयक, ड्राइवर और पंप ऑपरेटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर पिछले 10 से अधिक वर्षों से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे थे। सेवा के नियमितीकरण को लेकर इन कर्मचारियों ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जब विभाग ने उनकी अर्जी ठुकरा दी, तो कर्मचारियों ने अवमानना याचिका और फिर नई याचिका दायर की। इस पर 15 जनवरी 2024 को कोर्ट ने विभाग को उनके नियमितीकरण पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का निर्देश दिया था।
अदालत के इस आदेश के ठीक बाद भवन निर्माण विभाग ने 14 अगस्त 2024 को एक आदेश जारी कर उनकी दावेदारी यह कहकर खारिज कर दी कि उनकी नियुक्ति स्वीकृत पदों पर नहीं थी। इतना ही नहीं, बिना कोई लिखित आदेश या कारण बताओ नोटिस जारी किए कर्मचारियों को मौखिक रूप से नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
सरकारी फाइलों ने ही खोली विभाग के दावों की पोल
मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि सरकार की ओर से पेश किए गए तर्क उसके अपने ही आधिकारिक दस्तावेजों से पूरी तरह गलत साबित हो रहे हैं। विभागीय फाइलों की पड़ताल से साफ उजागर हुआ कि तत्कालीन प्रधान सचिव ने स्वयं इन नियुक्तियों को मंजूरी दी थी। इसके अलावा मुख्य अभियंता के वर्ष 2016 के पत्र से भी यह पूरी तरह प्रमाणित हो गया कि सभी कर्मचारी स्वीकृत पदों के विरुद्ध ही कार्यरत थे।
अवैध नहीं सिर्फ अनियमित थीं नियुक्तियां, नियमित करने का आदेश
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने मौखिक बर्खास्तगी को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि कर्मचारियों के वैध दावों को खत्म करने की नीयत से यह मनमाना कदम उठाया गया था। कोर्ट ने कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल विज्ञापन जारी न होने के आधार पर नियुक्तियों को पूरी तरह ‘अवैध’ नहीं करार दिया जा सकता, बल्कि इन्हें ‘अनियमित’ माना जाएगा।
चूंकि सभी कर्मचारी 10 साल से अधिक समय से लगातार स्थायी प्रकृति का काम कर रहे थे, इसलिए वे नियमितीकरण के पूर्ण हकदार हैं। अदालत ने राज्य सरकार की मनमानी कार्रवाई को निरस्त करते हुए सभी याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को विधिवत नियमित करने का अंतिम आदेश जारी कर दिया है।


