
Ranchi: देशभर में वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के नाम पर शुरू हुआ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया, बल्कि इसने एक बड़े सियासी बवंडर की शक्ल ले ली है। बिहार से शुरू हुई यह आग अब झारखंड के राजनीतिक गलियारों में पूरी ताकत से धधक रही है। राज्य सरकार के दो मंत्रियों ने सीधे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की नीयत पर सीधा मोर्चा खोल दिया है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने आयोग पर विपक्षी वोटों को काटने और केंद्र में बैठी सत्ताधारी पार्टी की मदद करने का खुला आरोप मढ़ते हुए झारखंड में इसे किसी भी कीमत पर लागू न होने देने का ऐलान कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने मौजूदा पूरी प्रक्रिया में भारी गड़बड़ियों की आशंका जताते हुए इसे तुरंत रद्द करने और नए सिरे से पारदर्शी तरीके से शुरू करने की मांग रख दी है।

इरफान अंसारी के तीखे बोल, बीजेपी के एजेंट बनकर काम कर रहे अफसर
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। उन्होंने मीडिया के सामने बेबाक आरोप लगाते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार स्वतंत्र संस्था के मुखिया के तौर पर नहीं, बल्कि बीजेपी के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। अंसारी ने दावा किया कि पूरे देश में SIR के नाम पर सुनियोजित तरीके से वोट चोरी का खेल खेला गया, जिससे एक दल विशेष को चुनावी फायदा पहुंचाया जा सके। उन्होंने यह भी कह डाला कि इसी वफादारी के बदले बीजेपी उन्हें देश का अगला राष्ट्रपति बनाने की तैयारी में है। मंत्री ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि झारखंड की जनता और सरकार इस चाल को समझ चुकी है और राज्य में इस व्यवस्था को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने बहुत जल्द इसके खिलाफ राज्यव्यापी राजनीतिक आंदोलन छेड़ने का दावा भी किया।

शिल्पी नेहा तिर्की की मांग, मौजूदा प्रक्रिया रद्द कर दोबारा हो काम
हेमंत सरकार की मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने भी इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और काटने की जो व्यवस्था बनाई गई है, उससे कई वर्गों के मतदाताओं में गहरा संशय पैदा हो गया है। उन्होंने मांग की कि राज्य में चल रही मौजूदा SIR प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए। शिल्पी नेहा तिर्की के मुताबिक, जब तक ऐसा नियम न बने जो गरीब, पिछड़े और वंचित तबके के हर नागरिक के लिए आसान और सुलभ हो, तब तक इसे आगे बढ़ाना लोकतंत्र के साथ अन्याय होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आयोग पहले उठ रहे तमाम सवालों का पुख्ता समाधान करे, उसके बाद ही किसी नई सूची पर विचार होना चाहिए।
7 अक्टूबर को आनी है फाइनल वोटर लिस्ट, टाइमलाइन से समझिए पूरा मामला
झारखंड में यह राजनीतिक टकराव ऐसे मोड़ पर आया है जब पूरी प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। राज्य में SIR की शुरुआत 30 जून 2026 को हुई थी, जिसके तहत बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) ने घर-घर जाकर मतदाताओं के दस्तावेजों और पतों का सत्यापन किया था। इसके बाद 5 अगस्त को ड्रॉफ्ट वोटर लिस्ट प्रकाशित की गई थी, जिस पर दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का समय दिया गया। तय कार्यक्रम के अनुसार, तमाम आपत्तियों के निपटारे के बाद 7 अक्टूबर 2026 को राज्य की अंतिम मतदाता सूची जारी की जानी है। ऐन फाइनल लिस्ट से ठीक पहले सरकार के मंत्रियों का खुलकर विरोध में उतरना यह साफ संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में यह मामला सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहने वाला।
दशकों बाद हुआ इतना बड़ा अभियान और आयोग के भीतर की रार
चुनाव आयोग के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर अब तक देश में समय-समय पर सिर्फ 8 बार ही इस स्तर का सघन पुनरीक्षण (SIR) हुआ है। एक लंबे अंतराल के बाद 2025-26 में चुनाव आयोग ने इसे अलग-अलग चरणों में फिर से शुरू किया। लेकिन शुरुआत से ही यह प्रक्रिया विवादों में घिरी रही। 2025 में जब बिहार में SIR लागू हुआ, तब भी विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे। उस वक्त मुख्य चुनाव आयुक्त ने आरोपों को खारिज करते हुए विपक्षी नेताओं से शपथपत्र के साथ सबूत देने की चुनौती दी थी। विवाद इतना बढ़ा कि अप्रैल 2026 में विपक्षी सांसदों ने उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में नोटिस तक दिया था। इसके बाद सितंबर 2026 में यह बात भी छनकर बाहर आई कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग की कई बैठकों में कुछ फैसलों पर अपनी असहमति जताई थी। हालांकि आयोग का हमेशा यही कहना रहा है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय आना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और सारे बड़े फैसले पूरे आयोग की सहमति से ही लिए गए हैं।


