
Digital Desk Naxatra Samachar: जिस चौखट पर लोग जिंदगी की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं और जहां की मशीनों पर पूरे राज्य का भरोसा टिका है, आज वही अस्पताल बुनियादी इंसानियत की सबसे छोटी जरूरत पूरी करने में लाचार नजर आ रहा है। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) में इन दिनों इलाज की दवाओं से ज्यादा मरीज और उनके तीमारदार पानी की तलाश में बेहाल हैं। वार्डों में भर्ती अपनों को बेड पर छोड़कर परिजन हाथों में खाली बोतलें और बाल्टियां लिए एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ लगा रहे हैं। अस्पताल के गलियारों में पसरा यह नजारा यह सोचने पर मजबूर करता है कि जो संस्थान खुद गंभीर रूप से बीमार हो चुका हो, उसकी व्यवस्था की नब्ज आखिर कौन टटोलेगा।

खाली बोतलें और सूखे नल, एक-एक घूंट के लिए मची मारामारी
रिम्स के वार्डों का रुख करते ही बदहाली की जमीनी तस्वीर सामने आ जाती है। अस्पताल में करीब दो हजार मरीज 24 घंटे भर्ती रहते हैं और हर सुबह हजारों लोग ओपीडी में डॉक्टरों की सलाह लेने पहुंचते हैं। लेकिन इस भारी-भरकम भीड़ के बीच बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं। न तो तीमारदारों को पीने का साफ पानी नसीब हो रहा है और न ही शौचालयों में इस्तेमाल के लिए नल से एक बूंद गिर रही है। घंटों से सूखे पड़े नलों के सामने खड़े लोग पानी के एक-एक घूंट के लिए तरस रहे हैं। जिसे जहां पानी की उम्मीद दिखती है, वह बाल्टी लेकर उसी तरफ भागता है, लेकिन ज्यादातर जगहों पर सिर्फ खाली पाइप और निराशा ही हाथ लगती है।

बंद लिफ्ट, टपकती छतें और गंदगी का अंबार
रिम्स के भीतर परेशानी सिर्फ पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि शिकायतों की एक लंबी फेहरिस्त है जो हर कोने में बिखरी पड़ी है। पुराने भवनों की हालत यह है कि हल्की बारिश होते ही छतों से पानी टपकने लगता है और फर्श पर सीपेज के चलते फिसलन बन जाती है। कई तलों पर मरीजों को ले जाने वाली लिफ्ट खराब पड़ी हैं, जिससे स्ट्रेचर पर लेटे गंभीर मरीजों और बुजुर्गों को सीढ़ियों के सहारे ऊपर ले जाना तीमारदारों के लिए किसी यातना से कम नहीं होता। बदबू मारते शौचालय और चारों तरफ फैली गंदगी के बीच लोग बीमारी से उबरने के बजाय उल्टे नए इन्फेक्शन की चपेट में आने का खतरा झेल रहे हैं।
सालाना करोड़ों का बजट, फिर भी जिम्मेदार बने बेपरवाह
सबसे चुभने वाला सवाल यह है कि हर साल स्वास्थ्य बजट से रिम्स को मिलने वाले करोड़ों रुपये आखिर कहां खप जाते हैं। जिस सरकारी संस्थान पर राज्य के गरीबों और आम नागरिकों का सबसे बड़ा हक है, वहां अगर मरीज को एक बोतल पानी के लिए बाहर की दुकानों पर निर्भर रहना पड़े तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नाकामी है। ऐसा लगता है मानो रिम्स का प्रबंधन किसी गहरे एनेस्थीसिया के असर में बेसुध पड़ा है, जिसे न तो वार्डों में सिसकते मरीजों की लाचारी नजर आ रही है और न ही परिजनों का गुस्सा। जब तक कुर्सी पर बैठे जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक रिम्स की यह बीमारी कभी ठीक नहीं हो पाएगी।


