
Ranchi: सिंहली भाषा के महान कथाकार और आधुनिक सिंहली साहित्य के प्रमुख साहित्यकार मार्टिन विक्रमसिंह की 50वीं पुण्यतिथि के मौके पर श्रीलंका के सबरगामुव विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान एक महत्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण हुआ।


झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची के हिंदी विभाग के वरिष्ठ सहायक आचार्य डॉ. उपेंद्र कुमार सत्यार्थी द्वारा संपादित पुस्तक ‘दक्षिण एशिया के महान साहित्यकार मार्टिन विक्रमसिंह और प्रेमचंद’ का लोकार्पण संगोष्ठी के दौरान किया गया। कार्यक्रम में भारत और श्रीलंका सहित कई देशों के विद्वान, लेखक, शिक्षक और शोधार्थी शामिल हुए।
दो महान कथाकारों के साहित्य को साथ रखकर अध्ययन
यह पुस्तक हिंदी और सिंहली साहित्य के दो प्रमुख यथार्थवादी कथाकारों प्रेमचंद और मार्टिन विक्रमसिंह के साहित्य को तुलनात्मक नजरिए से समझने की कोशिश करती है।
पुस्तक में दोनों साहित्यकारों की रचनाओं के जरिए ग्रामीण जीवन, आर्थिक असमानता, सामाजिक बदलाव, मानवीय रिश्तों और अपने-अपने समय की सामाजिक चुनौतियों को समझने का प्रयास किया गया है। इसी वजह से इसे भारत और श्रीलंका की साहित्यिक परंपराओं के बीच संवाद की एक पहल के रूप में देखा गया।
साहित्य दोनों देशों को करीब लाने का माध्यम
लोकार्पण के मौके पर सबरगामुव विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय एवं भाषा विभाग के संकायाध्यक्ष और कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. रोहन अबेविक्रमा ने पुस्तक के प्रकाशन पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक और बौद्धिक संबंध रहे हैं और साहित्य इन रिश्तों को और मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और मार्टिन विक्रमसिंह जैसे रचनाकारों को एक साथ रखकर किया गया अध्ययन दोनों देशों के पाठकों और शोधार्थियों को एक-दूसरे की साहित्यिक परंपराओं को समझने का अवसर देता है।
विद्वानों ने संपादक डॉ. सत्यार्थी को दी बधाई
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केलनिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लक्ष्मण सेनेविरत्न ने डॉ. उपेंद्र कुमार सत्यार्थी को पुस्तक के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और मार्टिन विक्रमसिंह दोनों ने सामान्य लोगों के जीवन और सामाजिक यथार्थ को अपनी रचनाओं में प्रमुखता दी है। उनके अनुसार दोनों साहित्यकारों को साथ रखकर किया गया तुलनात्मक अध्ययन भारत और श्रीलंका के साहित्य को समझने की दिशा में उपयोगी पहल है।
सबरगामुव विश्वविद्यालय के भाषा विभाग के प्रोफेसर और हिंदी भाषा एवं संगीत के विद्वान प्रो. संगीत रत्नायक ने भी पुस्तक के लोकार्पण को विश्वविद्यालय के लिए गौरव का अवसर बताया। उन्होंने पुस्तक में शामिल लेखों के लेखकों को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास दोनों देशों के अध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के बीच अकादमिक संवाद को आगे बढ़ा सकते हैं।
डॉ. सत्यार्थी बोले, दोनों रचनाकारों में कई समानताएं
पुस्तक के संपादक डॉ. उपेंद्र कुमार सत्यार्थी ने कहा कि प्रेमचंद और मार्टिन विक्रमसिंह के साहित्य में कई समानताएं दिखाई देती हैं। दोनों ने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज और आम इंसान के जीवन को समझने का जरिया बनाया।
उन्होंने कहा कि दोनों के कथा-साहित्य में ग्रामीण समाज, आम लोगों का जीवन, सामाजिक असमानता, आर्थिक संघर्ष, मानवीय संवेदनाएं और बदलता सामाजिक परिवेश प्रमुख रूप से दिखाई देता है। भारत और श्रीलंका के साहित्य को साथ रखकर देखने से दक्षिण एशिया की साझा संवेदनाओं और अलग-अलग साहित्यिक परंपराओं को समझने का मौका मिलता है।
डॉ. सत्यार्थी के अनुसार पुस्तक का उद्देश्य सिर्फ दो साहित्यकारों की तुलना करना नहीं है, बल्कि भारत और श्रीलंका के साहित्यिक संबंधों को नए अकादमिक नजरिए से समझने का प्रयास भी है। पुस्तक में अलग-अलग विद्वानों के शोधपरक आलेख शामिल हैं, जिनमें दोनों साहित्यकारों के साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है।
भारत से पहुंचे विद्वानों ने भी की सराहना
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत से मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए प्रो. जयंत कर शर्मा और कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. सुधीर सोनी ने भी पुस्तक के संपादन और प्रकाशन के लिए डॉ. उपेंद्र कुमार सत्यार्थी को बधाई दी।
मार्टिन विक्रमसिंह की 50वीं पुण्यतिथि के मौके पर आयोजित इस कार्यक्रम में पुस्तक का लोकार्पण सिर्फ एक प्रकाशन कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। प्रेमचंद और मार्टिन विक्रमसिंह के साहित्य को केंद्र में रखकर हुए इस आयोजन ने हिंदी और सिंहली साहित्य के बीच संवाद को एक साझा मंच दिया और दोनों देशों के साहित्यकारों, शिक्षकों और शोधार्थियों के बीच आगे भी तुलनात्मक अध्ययन और अकादमिक सहयोग की संभावनाओं को सामने रखा।


