
Digital Desk Naxatra Samachar: समय के पहिए भले ही दशकों आगे निकल चुके हों और भारत की आजादी का इतिहास किताबों के पन्नों में सिमट गया हो, लेकिन राजधानी रांची में आज भी उस ऐतिहासिक दौर की एक अनमोल निशानी पूरी शान के साथ जिंदा है। बात हो रही है 1928 मॉडल की उस विंटेज फोर्ड कार की, जिसमें कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सफर किया था। साल 1940 के ऐतिहासिक रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के दौरान बापू इसी कार में सवार होकर रांची से रामगढ़ पहुंचे थे। स्वतंत्रता आंदोलन और गांधीजी के सान्निध्य से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर को रांची का प्रतिष्ठित जायसवाल परिवार आज भी बेहद श्रद्धा और सलीके से संभाले हुए है। इस अनमोल विरासत को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रखने की कमान आदित्य विक्रम जायसवाल संभाले हुए हैं, जिनकी देखरेख में यह कार आज भी रांची की सड़कों पर उसी रफ्तार और रुतबे के साथ दौड़ती नजर आती है।

बापू कुटीर से रामगढ़ का सफर, पूर्वजों ने खुद चलाई थी स्टीयरिंग
इस विंटेज कार की कहानी सीधे आजादी के आंदोलन के स्वर्णिम पन्नों से जुड़ी है। जायसवाल परिवार के पूर्वज राय साहब लक्ष्मी नारायण जायसवाल ने विशेष रूप से यह 1928 मॉडल की फोर्ड कार मंगवाई थी। मार्च 1940 में जब रामगढ़ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 53वां ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित हुआ, तब महात्मा गांधी रांची पहुंचे थे और जायसवाल परिवार के आवास पर ठहरे थे, जिसे आज पूरी राजधानी ‘बापू कुटीर’ के नाम से जानती है। अधिवेशन में शामिल होने के लिए बापू इसी आवास से रवाना हुए थे। उस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान राय साहब लक्ष्मी नारायण जायसवाल और राम नारायण जायसवाल जी ने स्वयं ड्राइविंग सीट संभालकर महात्मा गांधी को इस कार से सुरक्षित रामगढ़ पहुंचाया था।

आदित्य विक्रम जायसवाल बोले- यह सिर्फ गाड़ी नहीं, आजादी की जीवंत विरासत है
पारिवारिक धरोहर को सहेज रहे आदित्य विक्रम जायसवाल बताते हैं कि उनके लिए यह विंटेज कार केवल पुरानी धातु का एक ढांचा भर नहीं है, बल्कि यह आजादी के संघर्ष, बापू के विचारों और उनके परिवार के राष्ट्रप्रेम का साक्षात प्रतीक है। हैरत की बात यह है कि करीब 98 साल पुरानी होने के बावजूद इस कार का इंजन और पुर्जे आज भी बेहतरीन स्थिति में हैं। जब यह विंटेज गाड़ी रांची की सड़कों पर निकलती है, तो राहगीर ठहरकर इसे निहारने लगते हैं। आदित्य विक्रम कहते हैं कि इस कार की हिफाजत करना उनके लिए किसी पूजा से कम नहीं है, क्योंकि इसमें उन पलों की खुशबू बसी है जब देश की आजादी की तकदीर लिखी जा रही थी।
राष्ट्रसेवा के लिए ठुकरा दी थीं ‘सर’ और ‘महाराजा’ जैसी उपाधियां
जायसवाल परिवार का नाता सिर्फ बापू की मेजबानी तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में इस परिवार ने अपने ऐशो-आराम और अंग्रेजी हुकूमत के बड़े सम्मानों की आहुति भी दी। आदित्य विक्रम जायसवाल ने बताया कि जब महात्मा गांधी ने देशवासियों से विदेशी व्यवस्था का बहिष्कार कर स्वाधीनता के यज्ञ में आहुति देने का आह्वान किया, तो उनके परिवार ने ब्रिटिश हुकूमत की दी हुई ‘महाराजा’ और ‘सर’ जैसी प्रतिष्ठित उपाधियों को एक झटके में त्याग दिया। परिवार के पूर्वज राय बहादुर ठाकुर दास जायसवाल बापू के विचारों से इतने गहरे प्रभावित हुए कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के उच्च एडवाइजर पद से इस्तीफा दे दिया और सारे विशेषाधिकार छोड़कर आजादी की अलख जगाने निकल पड़े।
आने वाली पीढ़ी तक इतिहास की रोशनी पहुंचाना ही सच्चा दायित्व
आदित्य विक्रम जायसवाल का मानना है कि बापू कुटीर और यह विंटेज कार आज के दौर में उस त्याग और तपस्या की याद दिलाते हैं जिसके बल पर देश को आजादी मिली। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया भौतिकता की दौड़ में आगे बढ़ रही है, ऐसे समय में युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से जोड़ना हम सभी का राष्ट्रीय कर्तव्य है। गांधीजी के विचार, उनकी सादगी और उनकी स्मृतियां आज भी समाज को सत्य, अहिंसा और राष्ट्रसेवा के पथ पर चलने की अटूट प्रेरणा देती हैं।


