
Jamshedpur: मां की ममता किसी जैविक बंधन या खून के रिश्ते की मोहताज नहीं होती। संतान को सिर्फ नौ महीने कोख में रखना ही मातृत्व नहीं, बल्कि किसी बेसहारा मासूम को अपना कलेजा बनाकर पालना, उसकी हिफाजत के लिए दुनिया से लड़ना और उसके सपनों के लिए अपनी जिंदगी झोंक देना ही मां होने की सबसे मुकम्मल परिभाषा है। जमशेदपुर के भालूबासा स्थित मुखी बस्ती से सामने आई बेबो किन्नर की दास्तान इसी पवित्र ममता का साक्षात रूप है। जिस मासूम को दुनिया में आते ही उसके अपने जन्म देने वाले माता-पिता ने लावारिस छोड़ दिया था, उसे बेबो ने न केवल अपनी गोद में समेटा, बल्कि एक मां की तरह पाल-पोसकर समाज में सिर उठाकर जीने लायक बनाया। आज 14 साल का गोविंदा उनकी पूरी कायनात है, और उसी बेटे की लंबी उम्र व तरक्की की कामना के लिए बेबो पिछले एक दशक से जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) का बेहद कठिन और निर्जला व्रत पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।

नवजात को जब अपनों ने त्यागा, तब बेबो ने दिया ममता का आंचल
करीब 14 साल पहले जब एक नवजात बच्चे को उसके सगे मां-बाप ने बेरहमी से ठुकरा दिया था, तब समाज के तानों और अपनी सीमाओं की परवाह किए बिना बेबो आगे आईं। उन्होंने उस बेजुबान बच्चे को अपने सीने से लगा लिया और उसका नाम रखा ‘गोविंदा’। यहीं से शुरू हुआ एक किन्नर का मां बनने और बच्चे का भविष्य संवारने का अनथक सफर। बेबो ने अपनी खुशियों को किनारे रखकर गोविंदा को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। उन्होंने ठान लिया था कि अभावों और मुश्किलों के बीच भी वे इस बच्चे की परवरिश में कोई कमी नहीं आने देंगी।

बधाई और परवी की कमाई से संवारा भविष्य, प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई
किन्नर समाज की आम जिंदगी की तरह बेबो का जीवन भी बेहद संघर्षों से भरा रहा है। वे लोगों के घरों में शादी-ब्याह और बच्चों के जन्म पर बधाई व परवी गाकर मिलने वाले नेग से अपना गुजारा करती हैं। सीमित आमदनी और तंगहाली के बावजूद उन्होंने कभी गोविंदा की परवरिश से समझौता नहीं किया। बेटे को बेहतर तालीम दिलाने के लिए उन्होंने पहले उसे सुंदरनगर स्थित जीटी हॉस्टल में रखकर पढ़ाया, ताकि उसे अनुशासन और अच्छी शिक्षा मिल सके। अब जब गोविंदा 14 साल का हो चुका है, तो बेबो उसे अपने पास भालूबासा ले आई हैं और इलाके के एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में पढ़ा रही हैं। बेबो का एक ही सपना है कि गोविंदा पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो और समाज में अपनी एक मुकम्मल पहचान बनाए।
बेटे की सलामती के लिए 10 साल से कठिन साधना, 3 अक्टूबर को होगी विशेष पूजा
संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और निरोगी काया के लिए माताओं द्वारा रखा जाने वाला जिउतिया पर्व 3 अक्तूबर को मनाया जाएगा। बेबो किन्नर इस पर्व को किसी पारंपरिक औपचारिकता की तरह नहीं, बल्कि एक मां की गहरी आस्था के साथ मनाती हैं। वे 2 अक्तूबर से ही दो दिनों तक चलने वाला यह कठिन उपवास शुरू कर देंगी और फलाहार पर रहकर साधना करेंगी। 3 अक्तूबर की शाम 7 बजे उनके आवास पर जिउतिया की पारंपरिक पूजा होगी, जिसमें शहर के अलग-अलग इलाकों से कई अन्य व्रत रखने वाली माताएं भी शामिल होंगी। बेबो बताती हैं कि पिछले 10 सालों से वे बिना नागा यह कठिन व्रत रख रही हैं, क्योंकि गोविंदा सिर्फ उनका पाला हुआ बच्चा नहीं, बल्कि उनकी हर सांस और दुआओं का केंद्र है।
रूढ़ियों को तोड़ती ममता की अनूठी मिसाल
आमतौर पर समाज किन्नर समुदाय को सिर्फ बधाई लेने और ताली बजाने के दायरे में देखता है, लेकिन बेबो किन्नर ने इस रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि प्यार और मातृत्व किसी जेंडर या पहचान की बंदिशों में नहीं बंधते। जब वे व्रत के दौरान भगवान से बेटे गोविंदा के लिए झोली फैलाती हैं, तो उस आंचल में सिर्फ एक मां का निस्वार्थ प्रेम, उसकी चिंताएं और बेटे के सुनहरे कल की उम्मीदें नजर आती हैं। बेबो और गोविंदा की यह कहानी यह संदेश देती है कि इस दुनिया में खून के रिश्तों से कहीं बड़ा रिश्ता इंसानियत और बेपनाह मोहब्बत का होता है।


