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मांदर की थाप पर अब थिरकेगी दुनिया!, झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा को मिला GI टैग ; जानिए कैसे गुमला के कारीगरों के हुनर ने रचा नया इतिहास

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Gumla: झारखंड की माटी की खुशबू, जंगलों की सरसराहट और यहां के लोकजीवन की धड़कन जिस वाद्ययंत्र की थाप पर थिरकती है, उस ‘मांदर’ के हुनर को अब आधिकारिक तौर पर देश और दुनिया के नक्शे पर एक अमिट पहचान मिल गई है। राज्य की समृद्ध लोक संस्कृति और जनजातीय परंपरा का प्रतीक माने जाने वाले मांदर को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने की खबर से गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित जरजट्टा गांव में उत्सव जैसा माहौल है। पीढ़ियों से अपनी उंगलियों के जादू से मांदर में जान फूंकने वाले कारीगरों के चेहरों पर बरसों की मेहनत रंग लाने की चमक साफ देखी जा सकती है। यह उपलब्धि सिर्फ एक वाद्ययंत्र को मिला तमगा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ी उस लोककला और कारीगरों के संघर्ष का सम्मान है जो आधुनिकता के शोर में भी अपनी विरासत को सीने से लगाए रहे।

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जरजट्टा गांव से शुरू हुई थी मुहिम, 5 साल बाद मुकम्मल हुआ सपना

मांदर को यह वैश्विक पहचान दिलाने की नींव जरजट्टा गांव से ही रखी गई थी। गांव के पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने 24 अक्टूबर 2021 को मांदर को जीआई टैग दिलाने के लिए ऑनलाइन आवेदन दाखिल किया था। करीब पांच साल तक दस्तावेजों, ऐतिहासिक प्रमाणों और निर्माण की अनूठी विधा की जांच-पड़ताल के बाद आखिरकार इस पारंपरिक वाद्ययंत्र को जीआई टैग की मुहर मिल गई। यह खबर जैसे ही गांव में पहुंची, मिट्टी और चमड़े को तराशने वाले हाथों में नई ऊर्जा भर गई। कारीगरों का मानना है कि इस टैग से अब उनके उत्पाद को नकली और मशीनी उत्पादों से सुरक्षा मिलेगी और उनके बनाए असली मांदर की साख पूरे देश में कायम होगी।

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लकड़ी, मिट्टी और चमड़े का संगम; बेहद कठिन है निर्माण की प्रक्रिया

स्थानीय कारीगर मंगरी देवी बताती हैं कि जरजट्टा गांव में दर्जनों परिवार कई पीढ़ियों से पारंपरिक तरीके से मांदर तैयार करने के काम में लगे हैं। उनके लिए मांदर सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और जीवन का अटूट हिस्सा है। एक मुकम्मल मांदर तैयार करना किसी साधना से कम नहीं होता। इसके लिए खास तरह की लकड़ी का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके बीच में पकी हुई मिट्टी का लेप और दोनों सिरों पर बकरे व अन्य पशुओं के चमड़े को विशेष तकनीक से कसा जाता है। चमड़े पर ‘खिरन’ (काले रंग का लेप) लगाने का हुनर बहुत कम लोगों के पास होता है, जिससे मांदर की वह गूंज पैदा होती है जो मीलों दूर तक सुनाई देती है। घंटों की इस कड़ी मशक्कत के बावजूद अब तक कारीगरों को बिचौलियों के चलते अपने हुनर का वाजिब दाम नहीं मिल पाता था, लेकिन जीआई टैग से यह स्थिति बदलने की उम्मीद जगी है।

बाजार और सरकारी मदद मिले तो बड़े रोजगार का जरिया बनेगी यह कला

मांदर निर्माण से जुड़े महारंग राम और गुलाब घासी जैसे अनुभवी कारीगरों का कहना है कि जीआई टैग मिलने से मांदर की मांग देश के बड़े महानगरों और सांस्कृतिक मंचों पर तेजी से बढ़ेगी। हालांकि, वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि इस पहचान का असली फायदा तभी मिलेगा जब सरकार और प्रशासन आगे आकर ठोस कदम उठाए। कारीगरों की मांग है कि उन्हें सीधा बाजार, बिक्री के लिए आधुनिक मंच, आसान वित्तीय सहायता और कार्यशालाओं की सुविधा दी जाए। यदि मांदर निर्माण को एक संगठित कुटीर उद्योग का रूप दिया जाए, तो यह न केवल स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेगा, बल्कि पलायन रोकने और नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक कला से जोड़े रखने में भी मील का पत्थर साबित होगा।

प्रशासन ने सराहा, उपायुक्त बोले- सांस्कृतिक धरोहर की बड़ी जीत

गुमला के उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने भी मांदर को जीआई टैग मिलने पर गहरी खुशी का इजहार किया है। उन्होंने इसे झारखंड की समृद्ध लोक विरासत और जरजट्टा के कर्मठ कारीगरों के लिए एक गौरवशाली क्षण बताया। उपायुक्त ने कहा कि मांदर झारखंड के करमा, सरहुल, सोहराय और तमाम सामाजिक उत्सवों की आत्मा है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि से पारंपरिक शिल्पकारों को आर्थिक मजबूती मिलेगी और जिले की पहचान सांस्कृतिक फलक पर और मजबूत होगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रशासन इस कला के संरक्षण और कारीगरों के कल्याण के लिए हर संभव सहयोग सुनिश्चित करेगा।

रिपोर्ट – दीपक, गुमला

 

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