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1964 का पुराना रास्ता अचानक कैसे बना खतरा?, बाबूलाल मरांडी ने CM से पूछा- क्या अफसर की मर्जी कानून से ऊपर है?

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DIG Road Controversy: झारखंड की सियासत में एक वरिष्ठ पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) के आवास और दशकों पुराने सार्वजनिक रास्ते को लेकर उपजा विवाद अब सीधे मुख्यमंत्री की चौखट तक पहुंच गया है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बेहद कड़ा और तीखा हमला बोला है। मरांडी ने बिना लाग-लपेट के दो टूक सलाह दी है कि अगर DIG साहब को अपने इलाके में इतनी ही असुरक्षा महसूस हो रही है, तो वे अपना बंगला बेचें और किसी पूरी तरह सुरक्षित जगह पर जाकर नया आशियाना तलाश लें।

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‘मुफ्त में भी मिले तो ऐसी जगह न रहें, अफसर ने की मूर्खता’

बाबूलाल मरांडी ने अपने बयान में लिखा कि बात भले ही कड़वी लगे, लेकिन यह हकीकत है कि यदि किसी धार्मिक या सामाजिक वजह से कोई इलाका असुरक्षित बताया जा रहा हो और कोई मुफ्त में भी वहां रहने की शर्त पर जमीन दे, तो कोई भी समझदार व्यक्ति साफ इनकार कर देगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर DIG साहब ने खाकी वर्दी की ताकत और अपने रसूख के दम पर यह सोचकर जमीन खरीदी थी कि बाद में लोगों को दबाकर आम रास्ता बंद करा देंगे और माहौल को अपने हिसाब से मोड़ लेंगे, तो ऐसी मानसिकता को समझदारी नहीं बल्कि सीधे-सीधे प्रशासनिक मूर्खता कहा जाएगा।

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‘जब DIG का जन्म भी नहीं हुआ होगा, तब से चल रहा है यह रास्ता’

पूर्व मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए लिखा कि जिस रास्ते को बंद करने के लिए आज कथित असुरक्षा का बहाना बनाया जा रहा है, वह रास्ता 1964 से यानी दशकों से आम जनता के उपयोग में है। उन्होंने कहा कि DIG साहब ने तो वह जमीन शायद पांच या छह साल पहले खरीदी होगी, जबकि वह रास्ता तब से आबाद है जब शायद खुद अफसर का जन्म भी नहीं हुआ था। मरांडी ने सवाल उठाया कि जो राह पीढ़ियों से आम लोगों की आवाजाही का जरिया रही, वह एक वर्दीधारी अफसर के कदम रखते ही अचानक सुरक्षा के लिए खतरा कैसे बन गई?

क्या वर्दीधारी की सुविधा कानून और जनता के हक से ऊपर है?

 

हेमंत सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए बाबूलाल मरांडी ने पूछा कि क्या सुरक्षा के नाम पर जनता का पारंपरिक रास्ता छीन लिया जाएगा और किसी बड़े अफसर की निजी सुविधा को कानून व संविधान से ऊपर मान लिया जाएगा? उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि असली समस्या रास्ते में नहीं है, बल्कि उस सामंती सोच में है जो पद, ताकत और वर्दी के अहंकार में आकर जनता के मौलिक और सार्वजनिक अधिकारों को अपनी निजी जागीर समझने की भूल कर बैठती है। इस सियासी हमले के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

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