
Jharkhand High Court: करीब चार दशक पुराने हत्या के एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने तीन दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है, जबकि चौथे आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने क्रिमिनल अपील पर सुनवाई करते हुए महागु यादव, बिंदेश्वर दुसाध और अखिलेश सिंह की दोषसिद्धि और सजा में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

वहीं रामरेखा यादव के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं मानते हुए हाईकोर्ट ने उसकी सजा रद्द कर दी।
1986 की रात घर से ले गए, अगले दिन मिला शव
मामला 28 अगस्त 1986 की रात का है। अभियोजन के मुताबिक, डालटनगंज जिले के रामविलास दुसाध पर एक नक्सली संगठन में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा था, लेकिन उसने इससे इनकार कर दिया था।
आरोप था कि घटना वाली रात हथियारों से लैस कुछ लोग उसके घर पहुंचे। बातचीत करने के बहाने रामविलास को अपने साथ ले गए। इसके बाद वह घर वापस नहीं लौटा।
अगले दिन उसका शव बरामद हुआ।
बंधे थे हाथ, गर्दन पर मिला था गहरा घाव
मृतक के हाथ बंधे हुए थे और गर्दन पर धारदार हथियार से गंभीर वार किया गया था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी इस केस में महत्वपूर्ण सबूत बनी। रिपोर्ट में गर्दन पर करीब 12 इंच लंबा गहरा घाव पाए जाने की बात सामने आई थी। अत्यधिक रक्तस्राव और सदमे को मौत का कारण बताया गया था।
हत्या को किसी ने नहीं देखा, फिर भी तीन की सजा क्यों रही बरकरार?
इस मामले में हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। इसके बावजूद कई गवाहों ने रामविलास को आरोपियों के साथ जाते हुए देखने की बात कही थी।
हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की इस कड़ी को महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि रामविलास को आरोपियों के साथ जाते देखा गया और इसके बाद अगले दिन उसका शव बरामद हुआ।
अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट समेत दूसरे साक्ष्यों को देखते हुए महागु यादव, बिंदेश्वर दुसाध और अखिलेश सिंह के मामले में निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
फिर रामरेखा यादव को क्यों किया गया बरी?
रामरेखा यादव के मामले में हाईकोर्ट का नजरिया अलग रहा। उसके खिलाफ पहचान मुख्य रूप से एक गवाह के साक्ष्य पर आधारित थी।
अदालत ने ऐसी स्थिति में उसे दोषी ठहराए रखना सुरक्षित नहीं माना। संदेह का लाभ देते हुए उसकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी गई।
इस तरह एक ही मामले में हाईकोर्ट ने तीन दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी, जबकि चौथे को बरी कर दिया।
25 लोगों के खिलाफ दाखिल हुई थी चार्जशीट
हत्या की जांच के बाद पुलिस ने कुल 25 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।
ट्रायल के दौरान 19 आरोपियों के मामले की सुनवाई हुई। इनमें 12 लोगों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था, जबकि सात को दोषी ठहराया गया था।
तीन दोषियों की मौत के बाद खत्म हुई उनकी अपील
दोषी ठहराए गए सात लोगों की ओर से हाईकोर्ट में अपील की गई थी। इनमें से तीन की अपील उनकी मृत्यु के बाद समाप्त हो गई।
बाकी चार आरोपियों की अपील पर हाईकोर्ट ने अब फैसला सुनाया है।
वर्ष 2000 से हाईकोर्ट में लंबित थी अपील
यह आपराधिक अपील वर्ष 2000 से झारखंड हाईकोर्ट में लंबित थी। करीब 26 साल बाद हाईकोर्ट में अपील का फैसला आया, जबकि मूल हत्या की घटना 1986 की थी।
अदालत के फैसले के बाद महागु यादव, बिंदेश्वर दुसाध और अखिलेश सिंह की उम्रकैद की सजा बरकरार रहेगी, जबकि रामरेखा यादव को इस मामले में संदेह का लाभ मिला है।


