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तमिलनाडु में कमाई के लिए हिंदी मीठी और दिशा दिखाने पर जहर क्यों?

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राजभाषा में जगह का नाम लिखने की इंजीनियर को मिली सजा पर उठ रहे सवाल
सिनेमा के करोड़ों से चमकती तिजोरी और सड़क के एक बोर्ड पर संस्कृति का वेंटिलेटर

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संपादकीय: धर्मवीर सिन्हा

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तमिलनाडु की जमीन पर इस वक्त पाखंड का सबसे बदसूरत नाच चल रहा है। हालात यह हैं कि वहां हिंदी भाषी दर्शकों की जेब से निकला एक-एक पैसा पूरी तरह से कुबूल है और सिर आंखों पर है। हिंदी पट्टी के पर्यटकों से मिलने वाला अरबों का राजस्व और रोजगार भी सरकार की तिजोरी को भरने का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है। लेकिन, विडंबना देखिए कि अगर उसी भाषा का एक अदद शब्द सड़क पर किसी अनजान राहगीर को रास्ता दिखाने के लिए लिख दिया जाए, तो अचानक से वहां का तथाकथित आत्मसम्मान और महान संस्कृति वेंटिलेटर पर पहुंच जाती है। कमाई के लिए हिंदी दुनिया की सबसे मीठी और प्यारी भाषा बन जाती है, और जब वही हिंदी किसी भटके हुए मुसाफिर को सही दिशा दिखाने का काम करे, तो वह अचानक से जहर बन जाती है।

ताजा मामला थूथूकुड़ी जिले का है, जहां राज्य राजमार्ग 93 पर लगे एक बेहद साधारण से दिशा-सूचक बोर्ड पर तिरुनेलवेली, थूथूकुड़ी और तिरुचेंदूर का नाम तमिल और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में क्या लिख दिया गया, पूरे राज्य के हुक्मरानों की दुनिया ही हिल गई। सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया। बोर्ड पर हिंदी देख मुख्यमंत्री विजय थलपति हत्थे से कबड़ गये और आनन-फानन में दो निरीह इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया। ताकि द्वि-भाषा नीति की तथाकथित शुचिता पर कोई आंच न आए। उस बोर्ड पर तुरंत कालिख पोती गई और हिंदी की पट्टी को बेरहमी से खुरच कर हटा दिया गया। ऐसा लगा मानो उस बोर्ड पर हिंदी लिख देना कोई बहुत बड़ा देशद्रोह या गंभीर अपराध हो गया हो।

लेकिन, इस दोहरे चरित्र का सबसे काला सच तब सामने आता है जब कॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारें अपनी तिजोरियां भरने निकलते हैं। जब रजनीकांत, कमल हासन, थलापति विजय (मौजूदा मुख्यमंत्री), धनुष या सूर्या की मेगा बजट फिल्में बनकर तैयार होती हैं, तो उनका हिंदी डबिंग वर्जन रिलीज करने में किसी का भी आत्मसम्मान आड़े नहीं आता। मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, रांची, धनबाद, गिरिडीह, बोकारो, दुमका, जमशेदपुर, देवघर और पटना के भव्य सिनेमाघरों में जब उत्तर भारत के करोड़ों हिंदी दर्शक टिकट खिड़की पर लंबी-लंबी कतारें लगाकर अपनी गाढ़ी कमाई का सैकड़ों करोड़ रुपया इन फिल्मों पर लुटाते हैं, तब उस हिंदी से कमाए गए एक-एक नोट पर कोई कालिख नहीं पोतता। ठीक वैसे ही, हर साल ऊटी और तमिलनाडु के अन्य खूबसूरत पर्यटक स्थलों की सैर करने आने वाले करीब चार करोड़ हिंदी भाषी सैलानियों के पैसों से जब राज्य का खजाना लबालब भरता है और हजारों स्थानीय परिवारों के चूल्हे जलते हैं, तब वह आर्थिक योगदान सिर-माथे पर स्वीकार कर लिया जाता है।

यह सीधा सा और बेशर्म पाखंड है कि अंग्रेजों की छोड़ी हुई औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी पर गर्व से सीना चौड़ा कर लिया जाता है, लेकिन देश के ही एक विशाल हिस्से की भाषा अगर किसी जरूरतमंद की सुविधा के लिए सड़क पर दिख जाए तो प्रशासनिक डंडा चल जाता है। तमिलनाडु में हर साल औसतन तीस करोड़ घरेलू पर्यटक आते हैं, जिनमें से उत्तर और मध्य भारत के हिंदी भाषी राज्यों से आने वाले सैलानियों की संख्या सालाना साढ़े तीन करोड़ तक होती है। रामेश्वरम, मदुरै, कन्याकुमारी से लेकर पर्यटक स्थल ऊटी और वैल्लोर व चेन्नई के अस्पतालों तक में इलाज कराने वाले यही लोग सालाना 15 से 25 हजार करोड़ रुपये का टर्नओवर स्थानीय अर्थव्यवस्था को देते हैं। इसी तरह तमिल फिल्म उद्योग अपने हिंदी डबिंग राइट्स और सैटेलाइट-ओटीटी अधिकारों के जरिए उत्तर भारत के बाजार से सालाना 15 सौ करोड़ रुपये तक बटोरता है।

दूसरी तरफ, तमिलनाडु की राजनीति जिस महान समाज सुधारक पेरियार के नाम पर अपनी दुकानें चलाती है, अगर उनके खुद के विचारों को खंगाला जाए तो इन नेताओं की हवा निकल जाएगी। पेरियार ने अपने भाषणों, लेखों और अपनी प्रसिद्ध पत्रिका विदुथलाई में कई बार तमिल को आदिम और असभ्य काल की भाषा बताया था। उनके विचारों के संकलन ग्रंथ ‘पेरियार ईवीआर सिन्दनैगळ’ और उनकी पुस्तिका ‘तमिलुम तमिलरुम’ में यह साफ दर्ज है कि उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि वे दशकों से कह रहे हैं कि तमिल एक बर्बर भाषा है, क्योंकि जब यह तीन-चार हजार साल पुरानी हुई थी, तब के लोग आदिम और असभ्य थे। जो लोग पेरियार का नाम लेकर राजनीति की रोटियां सेकते हैं, वे कभी यह नहीं बताते कि उनके भगवान कहे जाने वाले नेता की खुद की भाषा को लेकर क्या बेबाक राय थी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि उत्तर भारत में आज तक किसी ने भी तमिल, तेलुगु या मलयालम भाषा, संस्कृति या वहां के कलाकारों का कभी बहिष्कार नहीं किया है। किसी ने भी यहां के दफ्तरों में दक्षिण भारतीय नाम देखकर निलंबन के फरमान जारी नहीं किए। राष्ट्रीय एकता और भाईचारे की दुहाई पर चुप रहने वाले हिंदी समाज की इस महान उदारता को इन क्षुद्र राजनीतिक ताकतों ने हमेशा हमारी कमजोरी समझ लिया है। आखिर यह कैसा सड़ियल और दोहरा स्वाभिमान है, जहां हिंदी की कमाई से ऐशो-आराम पूरी तरह जिंदाबाद है, लेकिन हिंदी का अस्तित्व और उसकी बुनियादी मौजूदगी मुर्दाबाद है? यह देश विरोधी और संकीर्ण मानसिकता अब और अधिक सहन करने योग्य नहीं है।

उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों की यह आपराधिक और कायरतापूर्ण चुप्पी भी अब सवालों के घेरे में आनी चाहिए। दक्षिण भारत में अपनी भाषा के नाम पर राजनीतिक स्टंट करने वाले लोग खुलेआम हिंदी का अपमान करते हैं, उनके राज्य की इकोनॉमी को हमारे लोग खून-पसीना सींचकर पालते हैं, और हमारे ही देश में हमारी भाषा को अछूत मान लिया जाता है। इसके बावजूद उत्तर भारत के नेता और तथाकथित सांस्कृतिक मसीहा इस दोहरेपन पर अपनी जुबान तक नहीं खोलते। जब तक इस पाखंड और आर्थिक दोहन के इस गंदे खेल का पुरजोर विरोध नहीं होगा, तब तक यह क्षेत्रीय अहंकार यूं ही हिंदी भाषियों के आत्मसम्मान को कुचलता रहेगा। आज सोशल मीडिया पर भी यही सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर हिंदी भाषी कहने लगे हैं कि उत्तर भारत के पर्यटकों और सिनेमा प्रेमियों को अब तमिलनाडु के इस दोहरे मापदंड के खिलाफ आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर बहिष्कार का कड़ा रुख अपनाना चाहिए?

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