
Manipur Sexual Violence Case: मणिपुर यौन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने CBI और अधीनस्थ अदालत से कहा है कि मामले की दोनों प्रमुख पीड़ित-गवाहों की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित कर उनके बयान दर्ज कराए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि मुकदमे की सुनवाई तेजी से आगे बढ़नी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि दोनों पीड़ित-गवाहों की गवाही दर्ज होने के बाद आरोपियों की जमानत के मुद्दे पर विचार करना ज्यादा उचित होगा।

यह मामला दो आरोपियों को मिली जमानत रद्द कराने के लिए CBI की ओर से दाखिल याचिकाओं से जुड़ा है।
7, 9 और 28 अक्टूबर की तारीख बेहद अहम
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की।
अदालत ने CBI को निर्देश दिया कि दोनों पीड़ित-गवाहों को अधीनस्थ अदालत की ओर से तय तारीखों पर पेश कराना सुनिश्चित किया जाए।
आदेश के मुताबिक 7, 9 और 28 अक्टूबर को उनकी उपस्थिति सुनिश्चित कर बयान दर्ज किए जाने हैं। अधीनस्थ अदालत को भी आदेश का पालन करने और सभी पक्षों को इसमें पूरा सहयोग करने को कहा गया है।
CBI ने आरोपियों की जमानत पर उठाए सवाल
CBI की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह ने अदालत में कहा कि आरोपियों के जमानत पर बाहर रहने का असर गवाहों की गवाही देने की इच्छा पर पड़ सकता है।
CBI ने घटना की गंभीरता का जिक्र करते हुए दोनों आरोपियों की जमानत को चुनौती दी है। जांच एजेंसी की तरफ से यह भी बताया गया कि मामले का ट्रायल शुरू हो चुका है।
बचाव पक्ष ने ट्रायल की रफ्तार पर उठाया सवाल
आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने दूसरी तरफ दलील दी कि CBI मुकदमे को तय गति से आगे नहीं बढ़ा पाई है।
उन्होंने अदालत को बताया कि मामले में करीब 30 गवाह हैं और ट्रायल दूसरे चरण में पहुंच चुका है।
इसी दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि पीड़िताएं बयान दर्ज कराने के लिए उपलब्ध क्यों नहीं हो सकीं।
एक पीड़िता को डेंगू, पिछली तारीख पर था अवकाश
पीड़ित-शिकायतकर्ता की तरफ से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कोर्ट को बताया कि पिछली तारीख सार्वजनिक अवकाश के दिन पड़ी थी। जिन केंद्रों पर बयान दर्ज होने थे, वे उस दिन बंद थे।
अदालत को यह भी बताया गया कि एक पीड़िता डेंगू से पीड़ित है।
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अगर सुनवाई सार्वजनिक अवकाश के दिन रखी गई थी तो उस दिन पीड़ितों से पेश होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
‘गवाहों की सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी’
सुनवाई के दौरान CBI की तरफ से गवाहों की सुरक्षा और आरोपियों के बाहर रहने से पड़ने वाले संभावित असर का मुद्दा भी उठाया गया।
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर आरोपी जमानत की सुविधा का दुरुपयोग करते पाए जाते हैं तो अदालत इस मुद्दे पर विचार करने से पीछे नहीं हटेगी।
पहले बयान, उसके बाद जमानत पर फैसला
सुनवाई से यह संकेत मिला कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल दोनों प्रमुख पीड़ित-गवाहों के बयान दर्ज कराने को प्राथमिकता दे रहा है।
दोनों की गवाही दर्ज होने के बाद आरोपियों की जमानत रद्द करने की CBI की मांग पर आगे विचार किया जा सकता है।
मणिपुर हिंसा के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर
यह मामला मणिपुर में 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा से जुड़े उन मामलों में शामिल है, जिनकी सुप्रीम कोर्ट लगातार निगरानी कर रहा है।
इससे पहले शीर्ष अदालत ने राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की सुरक्षा और वहां हुई मौतों को लेकर भी सवाल उठाए थे। मणिपुर के मुख्य सचिव से इस संबंध में उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी गई थी।
अदालत मणिपुर और असम सरकार समेत संबंधित पक्षों से CBI और NIA के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था पर भी विचार करने को कह चुकी है।
मणिपुर में मई 2023 में जातीय हिंसा शुरू हुई थी। इसके बाद बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, लोग घायल हुए और हजारों परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा।


