
New Delhi: साल 2009 की बात है, जब एक 18 साल के लड़के के प्यार में पड़ी एक किशोरी ने अपनी छाती पर उसका नाम गुदवा लिया था। फिर दोनों अपनी खुशी से घूमते हुए मनाली की वादियों में निकल गए। उस उम्र की नादानी में शायद दोनों ही इस बात से बेखबर थे कि कानून की नजर में एक नाबालिग की मर्जी का कोई मोल नहीं होता। देखते ही देखते वह शुरुआती प्यार पुलिस की फाइलों में दर्ज होकर एक गंभीर कानूनी मुकदमा बन गया।

पंद्रह साल बाद अदालत का नरम रुख
कोर्ट-कचहरी और तारीखों का चक्कर काटते-काटते 15 साल का लंबा वक्त बीत गया। अब इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद मानवीय और व्यावहारिक फैसला सुनाया है। जस्टिस वीके यादव की अदालत ने आरोपी शख्स की सजा को घटाकर उतना ही कर दिया है, जितना समय वह पहले ही जेल में काट चुका है। जज ने अपने आदेश में कहा कि इतने लंबे समय बाद अब उस व्यक्ति को फिर से जेल भेजना न्याय का मजाक उड़ाने जैसा होगा।

बदल चुकी है दोनों की दुनिया
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर खास ध्यान दिया कि वक्त के साथ अब दोनों की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है। पीड़िता और आरोपी दोनों ही अब अपने-अपने जीवनसाथी के साथ नए सिरे से घर बसा चुके हैं और अपने परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इतने सालों तक चले मुकदमे ने उन्हें न सिर्फ समझदार बनाया है, बल्कि थका भी दिया है। कोर्ट में पीड़िता ने भी अब इस केस को आगे न खींचने की बात कही, जिसके बाद आरोपी ने अपना दोष मानते हुए केवल सजा कम करने की गुहार लगाई थी।
रोमियो-जूलियट क्लॉज की चर्चा
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट की एक सिफारिश का हवाला दिया, जिसमें ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ जैसा नियम लाने की बात कही गई थी। दुनिया के कई देशों में यह नियम लागू है, जो कम उम्र के लड़के-लड़कियों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक रिश्तों में राहत देता है, जहां उम्र का अंतर बहुत कम होता है। हाई कोर्ट ने भी माना कि उस वक्त दोनों के बीच एक रिश्ता था और नासमझी में कुछ बातें हो गईं। अब दोनों के साफ-सुथरे रिकॉर्ड को देखते हुए कोर्ट ने माना कि जेल में बिताया गया पुराना समय ही न्याय के मकसद को पूरा करने के लिए काफी है।


