
New Delhi: चुनाव आयोग के फैसलों और कार्यप्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत में दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े कई बड़े फैसले CEC ने अकेले अपने स्तर पर ले लिए, जबकि उन्हें पूरे तीन सदस्यीय आयोग की सर्वसम्मत राय बताकर लागू किया गया। अदालत इस पूरे मामले पर अब 27 अक्टूबर को अगली सुनवाई करेगी।

CEC को सस्पेंड करने की मांग अदालत ने खारिज की
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से मांगी गई अंतरिम राहत देने से साफ मना कर दिया। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने मांग की थी कि जांच पूरी होने तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सस्पेंड किया जाए या फिर यह आदेश दिया जाए कि आयोग के सभी फैसले तीनों आयुक्तों की आम सहमति से ही हों। इस पर बेंच ने दो टूक कहा कि अदालत सिर्फ मीडिया और अखबारों की खबरों के आधार पर इतना बड़ा फैसला नहीं ले सकती। इसके लिए आयोग का आधिकारिक पक्ष आना बेहद जरूरी है।

आयुक्तों और अफसरों को भी नोटिस, धारा 18 पर फंसा पेंच
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के साथ-साथ वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग और आईटी डीजी सीमा खन्ना को भी नोटिस भेजा है। बेंच ने साफ किया कि इस केस की मुख्य जड़ 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून की धारा 18 की सही व्याख्या से जुड़ी है। इस धारा के मुताबिक आयोग के सभी फैसले जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होने चाहिए और मतभेद की स्थिति में बहुमत की राय ही अंतिम मानी जाएगी। अदालत यह परखेगी कि क्या हाल के फैसलों में इस तय नियम का पालन हुआ है या नहीं।
नियुक्ति पैनल और कानूनी कवच पर भी उठे सवाल
वरिष्ठ वकील ने अदालत से यह भी अपील की कि अंतरिम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 वाले पुराने फैसले को लागू किया जाए, जिसके तहत सीईसी की नियुक्ति पैनल में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ चीफ जस्टिस भी शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने 2023 के कानून की धारा 16 का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयुक्तों को पद पर रहते और रिटायर होने के बाद भी हर तरह की कानूनी कार्रवाई से जिस तरह का कवच दिया गया है, वैसा तो जजों तक को हासिल नहीं है। इस पर जस्टिस बागची ने भी माना कि जजों को ऐसी छूट नहीं मिलती। फिलहाल अदालत ने साफ किया है कि बिना ठोस सबूत के कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता और अब सभी पक्षों के जवाब आने के बाद मामले की विस्तृत सुनवाई होगी।


