
पितृ दिवाली: मोक्षनगरी गया में इन दिनों पितृपक्ष महासंगम चल रहा है। देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना लेकर गया पहुंच रहे हैं। लेकिन पितृपक्ष के बीच यहां एक ऐसी दिवाली भी मनाई जाती है, जिसका संबंध रोशनी और उत्सव से ज्यादा पितरों की विदाई और उनकी मुक्ति की कामना से जुड़ा है। इसे ‘पितृ दिवाली’ कहा जाता है।

त्रयोदशी पर दीयों से जगमगाए गया के घाट
पितृपक्ष की त्रयोदशी की शाम गया के धार्मिक स्थल और घाट सैकड़ों-हजारों दीयों से रोशन हो उठे। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के देवघाट और आसपास के इलाकों में पिंडदान करने पहुंचे श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों के नाम पर दीप जलाए।

श्रद्धालुओं ने फल्गु नदी में दीपदान कर अपने माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना की। प्रशासन की ओर से पटाखे फोड़ने पर रोक लगाई गई थी, इसलिए इस आयोजन में दीपों की रोशनी ही प्रमुख आकर्षण रही।
पितरों की विदाई से जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष की त्रयोदशी को पितरों के अपने परिजनों से मिलने और फिर अपने लोक लौटने का समय माना जाता है। इसी विश्वास के तहत गया में पिंडदानी अपने पूर्वजों के नाम पर दीप जलाते हैं। मान्यता है कि इन दीपों की रोशनी पितरों के मोक्ष के मार्ग को प्रकाशित करती है और उन्हें सम्मानपूर्वक विदाई देने का प्रतीक बनती है।
दीपों के बीच दिखा श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव
शाम ढलते ही गया के घाटों पर दीपों की कतारें दिखाई देने लगीं। हजारों दीयों की रोशनी के बीच श्रद्धालु अपने पूर्वजों को याद करते नजर आए। पितृ दिवाली सिर्फ दीप जलाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह उन पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता का भाव भी है, जिनके लिए लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से गया पहुंचते हैं।


