
गयाजी : सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB) में बायोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग की शोधार्थी कृतिका कुमारी अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठ गई हैं। शोधार्थी का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष बार-बार शिकायत और आवेदन देने के बावजूद उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। उन्होंने अपने शोध कार्य को पूरा करने में आ रही बाधाओं को दूर करने और पूर्व में की गई शिकायतों पर कार्रवाई की जानकारी देने की मांग की है।

कृतिका के अनुसार, उनका विश्वविद्यालय में नामांकन वर्ष 2019 में हुआ था। कोरोना काल के दौरान प्रोफेसर के साथ उनका शैक्षणिक संवाद सीमित रहा। वर्ष 2023 में विश्वविद्यालय लौटने के बाद उन्होंने अपने एक प्रोफेसर पर कथित रूप से अनुचित तरीके से पक्षपातपूर्ण सहयोग की मांग करने का आरोप लगाया। शोधार्थी का दावा है कि शिकायत करने के बाद विश्वविद्यालय ने उनकी समस्याओं पर उचित कार्रवाई करने के बजाय उनका नामांकन रद्द कर दिया।

इसके बाद उन्होंने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शोधार्थी के अनुसार, अदालत के आदेश के बाद वर्ष 2026 में उन्हें दोबारा नामांकन मिला। हालांकि, उनका कहना है कि इसके बाद भी उनकी शैक्षणिक समस्याएं बनी रहीं और पीएचडी पूरी करने में लगातार देरी हो रही है।
सुपरवाइजर के निलंबन से शोध कार्य प्रभावित होने का दावा
कृतिका कुमारी के अनुसार, उनके दूसरे शोध सुपरवाइजर प्रोफेसर आर.एस. राठौर को विश्वविद्यालय प्रशासन ने 14 या 15 जुलाई के आसपास निलंबित कर दिया। इसके बाद से उन्हें अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
शोधार्थी का कहना है कि उनका शोधपत्र तैयार हो चुका है और वे कॉन्फ्रेंस में भी भाग ले चुकी हैं। ऐसे में वे प्री-सबमिशन की प्रक्रिया पूरी करने की स्थिति में हैं, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण उनका शोध कार्य अटका हुआ है।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को कई आवेदन दिए गए हैं। हालांकि, उनके अनुसार अब तक उनकी समस्याओं का संतोषजनक समाधान नहीं हुआ है।
क्या हैं कृतिका की चार प्रमुख मांगें?
1. प्री-सबमिशन का नोटिफिकेशन जारी हो: शोधार्थी की पहली मांग है कि उनके शोध कार्य की वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्री-सबमिशन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया जाए, ताकि पीएचडी पूरी करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
2. यौन उत्पीड़न की शिकायत पर कार्रवाई की जानकारी मिले: कृतिका कुमारी ने प्रोफेसर आशीष शंकर के खिलाफ पूर्व में की गई शिकायतों और उन पर गठित समिति की जांच के परिणाम की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई।
3. कंप्यूटर चोरी के आरोप से संबंधित पत्र औपचारिक रूप से वापस लिया जाए: शोधार्थी के अनुसार, 9 सितंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से उन पर कंप्यूटर चोरी का आरोप लगाया गया था। उनका दावा है कि आरोप से संबंधित पत्र आधिकारिक लेटरहेड पर जारी किया गया, जबकि उसे वापस लेने की जानकारी केवल ईमेल के माध्यम से दी गई। अब वे चाहती हैं कि शिकायत या आरोप वापस लेने की सूचना भी आधिकारिक पत्र के माध्यम से जारी की जाए।
4. प्रोफेसर आर.एस. राठौर को दोबारा जिम्मेदारी दी जाए: शोधार्थी की चौथी मांग है कि उनके पूर्व सुपरवाइजर प्रोफेसर आर.एस. राठौर को दोबारा जिम्मेदारी दी जाए। उनका कहना है कि किसी नए सुपरवाइजर के अधीन जाने पर शोध का विषय बदलने की संभावना है, जिससे उनका समय और मेहनत दोनों प्रभावित होंगे।
प्रशासन से समाधान की उम्मीद
कृतिका का कहना है कि पीएचडी पूरी करने में पहले ही काफी समय लग चुका है। अब वे चाहती हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी मांगों पर स्पष्ट निर्णय ले, ताकि उनका शोध कार्य बिना किसी और देरी के पूरा हो सके।
शोधार्थी ने अनशन के माध्यम से विश्वविद्यालय प्रशासन का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है। फिलहाल, इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक पक्ष उपलब्ध नहीं है। आरोपों, शिकायतों और निलंबन से जुड़े तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्षों का जवाब सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
विश्वविद्यालय के PRO ने क्या कहा?
वहीं, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB) के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) मुदस्सिर आलम ने छात्रा के दावों को खारिज करते हुए विश्वविद्यालय का पक्ष रखा। उनके अनुसार, मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और हाईकोर्ट की ओर से विश्वविद्यालय को अब तक किसी प्रकार का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है।
उन्होंने ने कहा कि छात्रा के अनुरोध पर ही उनके सुपरवाइजर को बदला गया था। अब छात्रा उन्हें दोबारा सुपरवाइजर बनाना चाहती हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के लिए बार-बार अपना निर्णय बदलना संभव नहीं है।
प्री-सबमिशन नोटिफिकेशन के संबंध में PRO ने बताया कि विश्वविद्यालय के निर्धारित मानदंडों के अनुसार इसके लिए कम-से-कम दो रिसर्च पेपर प्रकाशित होना आवश्यक है। उनके मुताबिक, कृतिका का अब तक केवल एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ है। इसी कारण उन्हें प्री-सबमिशन का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया है।
फिलहाल, इस मामले में शोधार्थी और विश्वविद्यालय प्रशासन के दावों में अंतर है। मामले से जुड़े न्यायालयी दस्तावेजों, विश्वविद्यालय के नियमों और संबंधित शिकायत समिति के निष्कर्षों की स्वतंत्र पुष्टि के बाद ही पूरे घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।


