
सासाराम: बिहार के रोहतास जिले के सासाराम में स्थित मां ताराचंडी मंदिर आस्था, पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक विरासत का अनूठा संगम है। कैमूर पहाड़ियों की विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित इस मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। खासकर चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

मान्यता है कि मां ताराचंडी के दर्शन और पूजा-अर्चना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी वजह से माता को मनोकामना सिद्धि देवी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के आसपास पहाड़, झरने और प्राकृतिक जलस्रोत इस स्थान की खूबसूरती को और बढ़ाते हैं।

मां सती की दाहिनी आंख गिरने की है मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां ताराचंडी मंदिर उन शक्तिपीठों में शामिल है, जहां माता सती के शरीर का एक अंग गिरा था। कहा जाता है कि यहां माता सती की दाहिनी आंख गिरी थी।
कथा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तीनों लोकों में विचरण कर रहे थे, तब सृष्टि में भय और अशांति का माहौल बन गया था। इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र ने इस शक्तिपीठ का नाम तारा रखा था। कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने सहस्रबाहु को पराजित करने के बाद यहां मां तारा की उपासना की थी। धार्मिक कथा के मुताबिक, इसी स्थान पर देवी ने चंड का वध किया, जिसके बाद उन्हें चंडी कहा जाने लगा।
12वीं सदी का शिलालेख मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण
मां ताराचंडी मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। मंदिर की प्राचीनता से जुड़े लिखित प्रमाण सीमित हैं, लेकिन परिसर में मौजूद शिलालेख इसकी ऐतिहासिक पहचान को सामने लाता है।
मंदिर के गर्भगृह के पास संवत 1229 का एक विशाल शिलालेख मौजूद है, जिसे 12वीं शताब्दी का माना जाता है। बताया जाता है कि खरवार वंश के शासक महाराजा प्रताप धवल देव ने इसे अपने पुत्र शत्रुघ्न के माध्यम से अंकित करवाया था।
पुरातत्व और इतिहास के जानकारों के अनुसार, मंदिर परिसर में मां तारा, सूर्य देव और अग्नि की खंडित प्रतिमाएं भी प्राचीन कला परंपरा की झलक दिखाती हैं। इन प्रतिमाओं को उत्तर-गुप्त काल से जोड़कर देखा जाता है।
साल में तीन बार लगता है मेला
मां ताराचंडी धाम में सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां वर्ष में तीन बार मेला लगने की परंपरा बताई जाती है। सावन के महीने में लगने वाले मेले में भी बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं।
श्रावणी पूर्णिमा पर स्थानीय लोग मां ताराचंडी को शहर की कुलदेवी मानकर चुनरी और प्रसाद चढ़ाने पहुंचते हैं। इस अवसर पर हाथी-घोड़े और बैंड-बाजे के साथ शोभायात्रा निकालने की भी परंपरा है।
नवरात्र में अखंड दीप जलाने की परंपरा
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान मां ताराचंडी धाम में विशेष पूजा-अर्चना होती है। इस दौरान अखंड दीप जलाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, मनोकामना पूरी होने पर भक्त मां के दरबार में अखंड दीप जलाते हैं।
बताया जाता है कि पिछले कुछ वर्षों में अखंड दीप जलाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और दूसरे राज्यों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान मंदिर में लाखों श्रद्धालुओं के आने की बात कही जाती है।
आस्था, लोकमान्यताओं और प्राचीन विरासत के कारण मां ताराचंडी मंदिर बिहार के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी खास पहचान रखता है। यहां आने वाले श्रद्धालु मां के दर्शन के साथ पहाड़ी प्राकृतिक वातावरण का भी अनुभव करते हैं।
(विकाश चंदन की रिपोर्ट)


