
मां ताराचंडी धाम: रोहतास का मां ताराचंडी मंदिर आस्था, पौराणिक मान्यताओं और इतिहास का अनूठा संगम है। सासाराम से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित यह प्रसिद्ध धाम देश के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती की दाहिनी आंख गिरी थी। भगवान परशुराम की तपोभूमि से जुड़ी कथाएं और मंदिर परिसर में मौजूद 12वीं शताब्दी का शिलालेख इस स्थल को धार्मिक ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी खास बनाते हैं।

पहाड़ियों और प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बसा है धाम
बिहार के रोहतास जिले में स्थित मां ताराचंडी धाम कैमूर की पहाड़ियों के बीच बसा एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। पहाड़ियों, जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह मंदिर श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है।

सासाराम से लगभग 8 किलोमीटर और डेहरी-ऑन-सोन से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर में सालभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। हालांकि, चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ और धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।
माता सती की दाहिनी आंख गिरने की मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के अंगों को अलग किया था। मान्यता है कि माता सती की दाहिनी आंख इसी स्थान पर गिरी थी, जिसके कारण यह स्थल शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय हुआ।
श्रद्धालु मां ताराचंडी को मनोकामना पूरी करने वाली देवी मानते हैं। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दरबार में की गई प्रार्थना से उन्हें मानसिक शांति और आशीर्वाद मिलता है।
भगवान परशुराम की तपोभूमि से जुड़ी हैं कथाएं
मां ताराचंडी धाम से भगवान परशुराम की तपस्या से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम ‘तारा’ रखा था। धार्मिक कथाओं के अनुसार, सहस्रबाहु अर्जुन को पराजित करने के बाद भगवान परशुराम ने यहां तपस्या की और मां तारा से शक्ति प्राप्त की।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, मां तारा ने बालिका के रूप में प्रकट होकर चंड नामक असुर का वध किया था। इसी कथा से देवी का नाम ‘ताराचंडी’ पड़ने की मान्यता जुड़ी हुई है।
12वीं सदी का शिलालेख मंदिर के इतिहास का अहम प्रमाण
मां ताराचंडी धाम का महत्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। मंदिर परिसर में मौजूद पुरातात्विक अवशेष और ऐतिहासिक शिलालेख भी इसकी प्राचीनता की ओर संकेत करते हैं।
यहां गर्भगृह के पास संवत 1229 का एक शिलालेख मौजूद होने की जानकारी दी जाती है, जिसे 12वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है। बताया जाता है कि खरवार वंश के शासक महाराजा प्रताप धवल देव ने अपने पुत्र शत्रुघ्न के माध्यम से इसे उत्कीर्ण कराया था। यह शिलालेख मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए एक अहम साक्ष्य माना जाता है।
परिसर में मां तारा, सूर्य देव और अग्नि देव की खंडित प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। इन प्रतिमाओं को उत्तर-गुप्त काल से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इनके काल निर्धारण और शिलालेख के विवरण की पुष्टि के लिए पुरातात्विक अभिलेखों का अध्ययन महत्वपूर्ण है।
साल में तीन बार लगता है मेला
मां ताराचंडी धाम में सालभर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। यहां वर्ष में तीन बार प्रमुख मेलों के आयोजन की परंपरा बताई जाती है। सावन का मेला विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
श्रावणी पूर्णिमा: इस अवसर पर स्थानीय श्रद्धालु मां को अपनी कुलदेवी मानकर शोभायात्रा निकालते हैं। हाथी-घोड़े, बैंड-बाजे और धार्मिक उत्साह के बीच भक्त मां को चुनरी और प्रसाद अर्पित करते हैं।
शारदीय नवरात्र: नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अष्टमी के दिन मां महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना का महत्व बताया जाता है।
अखंड दीपों की परंपरा: जिन श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होने का विश्वास होता है, वे मां के दरबार में अखंड दीप जलाते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यह परंपरा विशेष रूप से दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र
मंदिर के सेवादार गौरी शंकर पांडेय के अनुसार, मां ताराचंडी धाम अत्यंत प्राचीन और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था से जुड़ा स्थल है। नवरात्र के दौरान अखंड दीपों से मंदिर परिसर का दृश्य बेहद आकर्षक हो जाता है। उनके मुताबिक, यह धाम करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।
वहीं, बक्सर से दर्शन करने आने वाली श्रद्धालु चांदनी बताती हैं कि वह हर साल मां के दर्शन के लिए पहुंचती हैं। उनके अनुसार, मंदिर में आकर मानसिक शांति मिलती है और मां के प्रति उनकी आस्था और मजबूत होती है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि मंदिर की धार्मिक पहचान को देखते हुए यहां पर्यटन सुविधाओं, साफ-सफाई, पेयजल और अन्य नागरिक सुविधाओं को और बेहतर बनाने की जरूरत है।
आस्था, इतिहास और पर्यटन का संगम
मां ताराचंडी धाम रोहतास की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। माता सती से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं, भगवान परशुराम की तपस्या की कथाएं, प्राचीन प्रतिमाएं और 12वीं सदी का बताया जाने वाला शिलालेख इस स्थल को खास बनाते हैं।
बेहतर पर्यटन सुविधाओं और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के जरिए इस धाम को धार्मिक पर्यटन के एक प्रमुख केंद्र के रूप में और विकसित किया जा सकता है।
(समाचार संकलन: विकास चंदन)


