
Jharkhand High Court : झारखंड HC ने सार्वजनिक रास्ते से अतिक्रमण हटाने से जुड़े एक अहम मामले में कानूनी प्रक्रिया को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की कोर्ट ने कहा कि CRPC की धारा 133 के तहत कोई भी फाइनल एक्शन लेने से पहले प्रारंभिक आदेश (प्रारंभिक नोटिस) जारी करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके अलावा, जिस पक्ष पर आरोप हैं, उसे अपना पक्ष रखने और सबूत (एविडेंस) पेश करने का पूरा मौका मिलना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया का सही से पालन न किए जाने के कारण अदालत ने मधुपुर SDM के आदेश को रद्द कर दिया है और नए सिरे से कानून के मुताबिक फैसला लेने का निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ता ने दी थी दोनों आदेशों को चुनौती
यह मामला सुशील कुमार विश्वास की याचिका पर सामने आया। उन्होंने देवघर के अपर सत्र न्यायाधीश (एडिशनल सेशंस जज) द्वारा 4 सितंबर 2021 को अपनी क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन खारिज किए जाने के फैसले और मधुपुर SDM के 13 मई 2017 के आदेश को HC में चुनौती दी थी। SDM ने खाता नंबर 220 और होल्डिंग नंबर 127 में बने कथित अवरोध को 15 दिनों के भीतर हटाने का फरमान सुनाया था और ऐसा न करने पर IPC की धारा 188 के तहत कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी।

CO की रिपोर्ट को नजरअंदाज करने का आरोप
मामले की शुरुआत विपक्षी पार्टी की शिकायत से हुई थी, जिसमें रास्ता ब्लॉक करने का आरोप लगा था। इस पर SDM ने 11 सितंबर 2015 को मधुपुर CO (अंचल अधिकारी) से जांच रिपोर्ट मांगी थी कि क्या वह जमीन सार्वजनिक है। CO ने 3 अक्टूबर 2015 को अपनी रिपोर्ट में साफ लिख दिया था कि वहां किसी भी पब्लिक रोड पर कोई रुकावट नहीं है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि SDM ने CO की इस रिपोर्ट को दरकिनार कर दिया और पुरानी रिपोर्ट्स के आधार पर एकतरफा कार्रवाई का आदेश दे दिया।
सबूत पेश करने का नहीं मिला था मौका
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि SDM कोर्ट में जवाब दाखिल करने के बाद भी उन्हें अपने पक्ष में दस्तावेज और सबूत पेश करने का कानूनी अवसर नहीं दिया गया। साथ ही, CRPC 133 के तहत जो कानूनी प्रक्रिया और प्रारंभिक आदेश अनिवार्य होता है, उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।
HC ने याद दिलाई कानूनी प्रक्रिया की अहमियत
झारखंड HC ने पूरे रिकॉर्ड और आदेशों की बारीकी से जांच करने के बाद पाया कि SDM स्तर पर प्रक्रियागत चूक हुई है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि सार्वजनिक न्यूसेंस या अवरोध हटाने से जुड़े मामलों में धारा 133 का प्रारंभिक आदेश पारित करना एक अनिवार्य शर्त है। अदालत ने निर्देश दिया कि पूरे मामले की सुनवाई अब तय कानूनी नियमों के तहत दोबारा की जाए।


