
Jharkhand High Court: एक ही अपराध के लिए पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) दोनों के तहत अलग-अलग सजाएं जोड़कर लगातार नहीं चलाई जा सकतीं। झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान साफ किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा-42 के अनुसार दोनों कानूनों में से जिसमें अधिक सजा का प्रावधान है, वही सजा लागू होगी। इस आधार पर अदालत ने दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई अलग-अलग सजा के आदेश को निरस्त कर दिया और 13 साल जेल में काट चुके अभियुक्त को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की बेंच का फैसला
यह आदेश जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोषी की अपील याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने सिमडेगा के अपर सत्र न्यायाधीश सह विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा जुलाई 2015 में सुनाए गए फैसले और सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म का दोषी मानते हुए दोनों कानूनों के तहत अलग-अलग सजाएं सुनाई थीं और उन्हें एक के बाद एक (लगातार) भुगतने का आदेश दिया था।

ट्रायल कोर्ट ने दी थी 10-10 साल की दोहरी सजा
मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376(2)(एफ), 323, 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा-4 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने आईपीसी की धारा 376(2)(F) में 10 साल का कठोर कारावास और POCSO एक्ट की धारा-4 में भी अलग से 10 साल के कठोर कारावास की सजा तय की थी। ट्रायल कोर्ट के निर्देश के अनुसार दोनों सजाएं एक के बाद एक चलनी थीं, जिसके चलते आरोपी को 20 साल जेल में बिताने पड़ते।
धारा-42 के तहत तय हुआ कानून, 13 साल बाद रिहाई का रास्ता साफ
हाईकोर्ट ने मामले की कानूनी समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि एक ही कृत्य के लिए दो अलग-अलग कानूनों के तहत लगातार चलने वाली सजा देना कानूनी प्रावधानों के खिलाफ है। अदालत ने पॉक्सो एक्ट के तहत दी गई अतिरिक्त 10 साल की सजा को हटा दिया। चूंकि आरोपी पहले ही 13 साल से अधिक समय जेल में गुजार चुका है और उसकी मुख्य सजा की अवधि पूरी हो चुकी है, इसलिए हाईकोर्ट ने उसे तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश जारी कर दिया।


